शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

समाज:बदलती अवधारणायें -बदलते परिदृश्य

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है,यह तो सबको पता है लेकिन सामाजिक सरोकारों के साथ मानव को सामाजिकता के साथ -साथ असामाजिकता का दंश भी झेलना पड़ा है. आज कल बदलते मूल्यों के साथ लोंगो नें समाज के प्रति अपनी-अपनी अलग धारणाओं के चलते अलग परिभाषा भी बना ली है. हिन्दी शब्दकोश भी में भी समाज को समान कार्य करने वालों का समूह ही कहा गया है. .
पहले समाज शब्द को बहुत व्यापकता प्रदान थी,बदलते दौर नें इसको और भी सीमित करते हुए एक नई व्यवस्था स्थापित की, एकदम हिन्दी शब्दकोश की तर्ज़ पर , सब लोंगों नें अपनें-अपने नये समाज बना लिए और नये-नये शब्द भी प्रचलन में आये -जातीय समाजों के अलग-अलग मानक स्थापित किये गये.समाज की विस्तृत अवधारणा को संकुचित करते हुए विभिन्न जातियों-उपजातियों के समाजों की स्थापना हुई- फिर बात सर्व समाज -बहुजन समाज तक गयी..आज जो जहाँ हैं अपनी सुविधा के लिए अपना समाज बनाया बैठा है और वह उससे ऊपर नहीं जाना चाहता.वह इसी में खुश है और उसे गुमान भी है कि उसका कोई समाज है. आज -कल समाज शब्द की पूर्व व्यापकता को इतना सीमित कर दिया गया है कि समझ में नहीं आता कि अगला व्यक्ति इसे किस रूप में व्याख्यायित कर रहा है .जैसे कोई शराबी है वह दो-चार शराबियों को ही अपना समाज मानता है,हर नशेड़ी नशा करनें वाले समाज में ही खुश है और उसे उसी में उसे संतोष है,भ्रष्टाचार में डूबे को भ्रष्टाचार से जुड़े लोग ही पसंद आते हैं .
सबसे बड़े दुःख में आज -कल बुद्धिजीवी बेचारे हैं उनका कोई समाज नहीं बन पा रहा,कारण यह है कि समाज में ज्ञानियों का अकाल पड़ गया है ,कोई गुणवान बनना नहीं चाहता और न ही उपदेश सुनना चाहता है.बदलते हालात नें इनको इस कदर अलग-थलग कर दिया है कि समाज में तो छोडिये इन्हें अपनें घर में कोई नहीं सुन रहा है .इसी लिए वे समाज में अछूत हो चले हैं.तथा कथित बुद्धिजीवी बेचारों को आज कोई पूछनें वाला नहीं है , वे बेचारे पहले शिक्षा के क्षेत्र में गये जब वहाँ भी अवसरवादी टूट पड़े तो राजनीति में किस्मत अजमाने लगे ,फिर पत्रकारिता को अपना कर अपनें सम्मान को बचानें के लिए अखबारों को अपना हथियार बनाया- जब वहाँ भी दबंग बिरादरी पहुचनें लगी तो बेचारे बन अब ब्लॉग जगत में आ गये है.देखिये कब तक ब्लॉग जगत में टिक पाते हैं,क्योंकि अब ब्लॉग को भी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बता -बता कर लोंगो को जागरूक किया जा रहा है,वह दिन दूर नहीं जब ब्लॉग पर बुद्धिजीवियों को टार्च लेकर ढूढना पड़ेगा।
जरा हास्यावतार चच्चा जी बनारसी (स्व. अन्नपूर्णा जी)की इन लाइनों पर भी गौर फरमाएं -------
बीर रहे बलवान रहे वर बुद्धि रही बहु युद्ध सम्हारे |
पूरण पुंज प्रताप रहे सदग्रन्थ रचे शुभ पंथ सवारे||
धाक रही धरती तल पे नर पुंगव थे पुरुषारथ धारे|
बापके बापके बापके बापके बापके बाप हमारे ||


30 टिप्‍पणियां:

  1. आज के समाज :-) में समझदारों के लिए कौनों जगह बाकी नहीं बची ! लट्ठ बाजों को भी गूगल नें फ्री में प्रकाशन करने का काम टिका दिया है ! अब लेखकों की कौन जी हुजूरी करे खुद ही लिखो और छापो ! टिप्पणी ने नाम पर वाह वाह २० जगह रोज करते रहो तो पढने वाले भी मिल जायेंगे !
    मारो इन बुद्धिजीवियों को ....
    वैसे यह हैं कौन ??

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  2. बहुत रोचक चिंतन है.... मस्त :)

    चच्चा बनारसी Rocks! :)

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  3. "...सबसे बड़े दुःख में आज -कल बुद्धिजीवी बेचारे हैं उनका कोई समाज नहीं बन पा रहा, कारण यह है कि समाज में ज्ञानियों का अकाल पड़ गया है ,कोई गुणवान बनना नहीं चाहता और न ही उपदेश सुनना चाहता है..."

    लगता है कि आप सार्वजनिक वाहनों में घूमने के आदि नहीं. अन्यथा आपकी यह धरणा बदल गई होती :)

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  4. बुद्धिजीवियों से सम्बंधित आपकी चिंता जायज है ...
    काजल कुमार जी का व्यग्य लाजवाब है !

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  5. जब वहाँ भी दबंग बिरादरी पहुचनें लगी तो बेचारे बन अब ब्लॉग जगत में आ गये है.देखिये कब तक ब्लॉग जगत में टिक पाते हैं,क्योंकि अब ब्लॉग को भी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बता -बता कर लोंगो को जागरूक किया जा रहा है,
    लेकिन इन दंबग लोगो के पास बुद्धि नाम की चीज नही, यह सब गधे हे, थोडे दिनो मे ही एक दुसरे को दुलती मारेगे, ओर अपना मुंह काला कर के खुद ही दफ़ा हो जायेगे, इन्हे मुंह लगाने की जरुरत ही नही.आप के लेख से सहमत हे जी, धन्यवाद

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  6. सार्थक चिन्तन। आपसे सहमत हूं। आभार।

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  7. मस्त पोस्ट।
    बाप के बाप के बाप के बाप हमारे...सिर्फ इस एक पंक्ति ने गज़ब का हस्य-व्यंग्य सृजित किया है।

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  8. वह दिन दूर नहीं जब ब्लॉग पर बुद्धिजीवियों को टार्च लेकर ढूढना पड़ेगा।

    काश ऐसा दिन कभी न आये...:-)

    नीरज

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  9. सही है ,बुद्धिजीवी भी अब यहाँ से सटक लेने वाले है या किनारे कर दिए जाने वाले हैं ....

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  10. डॉ मनोज मिश्र जी, आपको और भाभीजी को वैवाहिक वर्षगांठ की बहुत बहुत हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

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  11. आपको व भाभी जी को विवाह की वर्ष्गाँठ पर हार्दिक शुभकामनायें।

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  12. डॉ मनोज मिश्र जी,
    सफल दाम्पत्य जीवन के लिये हार्दिक शुभकामनायें।
    आपका जीवन
    सुख, शान्ति,
    स्वास्थ्य
    एवं समृद्धि से परिपूर्ण हो।

    इस अवसर पर एक वृक्ष लगायें।
    इस दिन को यादगार बनायें॥

    पृथ्वी के शोभाधायक, मानवता के संरक्षक, पालक, पोषक एवं संवर्द्धक वृक्षों का जीवन आज संकटापन्न है। वृक्ष मानवता के लिये प्रकृति प्रदत्त एक अमूल्य उपहार हैं। कृपया अपने विवाह की वर्षगाँठ के शुभ अवसर पर एक वृक्ष लगाकर प्रकृति-संरक्षण के इस महायज्ञ में सहभागी बनें।

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  13. समाज की बदलती अवधारणा को प्रस्तुत करता एक सार्थक लेख..........

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  14. आदरणीय डॉ.मनोज मिश्र जी

    ♥ * आपको एवम् भाभीजी को * ♥
    ♥~*~वैवाहिक वर्षगांठ की~*~♥
    ♥ ~*~हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !~*~ ♥



    ♥ प्रेम बिना निस्सार है यह सारा संसार !♥
    बसंत ॠतु की भी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  15. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...
    सुखमय वैवाहिक वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनाएं ♥

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  16. सार्थक लेखन ।
    वैवाहिक वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनायें मनोज जी ।

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  17. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...
    सुखमय वैवाहिक वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनाएं ♥

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  18. आपके व्लाग को फालोअर का शतक मुबारक हो यह सौभाग्य मैंने लिया व्लागर के दुःख को जल्दी भांप लिया आपने अच्छा आलेख ,आभार

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  19. अच्छा करारा नया वि़शय और व्यंग

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  20. बहुत ही उम्दा रचना , बधाई स्वीकार करें .
    आइये हमारे साथ उत्तरप्रदेश ब्लॉगर्स असोसिएसन पर और अपनी आवाज़ को बुलंद करें .कृपया फालोवर बनकर उत्साह वर्धन कीजिये

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  21. aapka lekh aacha laga.

    chinta mat kijiye manoj ji behta paani behta hi rahega. agar duniya main burai aur kuritian na ho to fir acchayi ki kadr kaun karega. ha itna bhi naa ho ki acchayi ko torch lekar hi dhoondna pare. shukriya

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आपकी टिप्पणियाँ मेरे ब्लॉग जीवन लिए प्राण वायु से कमतर नहीं ,आपका अग्रिम आभार एवं स्वागत !