शनिवार, 2 जुलाई 2011

एपार जौनपुर - ओपार जौनपुर ..मादरडीह गांव -2

गतांक से आगे......
अब तक के उत्खनन के आधार पर मेरी पिछली पोस्ट में इस संभावना की ओर इशारा किया गया था कि संभव है कि आज से करीब २५०० वर्ष पूर्व यहाँ एक नगरीय और विकसित संस्कृति स्थापित थी .इस दिशा में कुछ आरंभिक संकेत मिलनें भी लगे है . करीब दो उत्खनित स्थल पर रिंग बेल का प्रमाण मिला है.यह रिंग बेल प्राचीन भारत में सोखताके रूप में इस्तेमाल में लाया जाता था जहाँ गंदे पानी आदि को इकट्ठा किया जाता रहा होगा।उस समय में यह रिंग बेल मिट्टी को गूंथ कर और फिर आग में पका कर इस्तेमाल में लाये जाते थे।
चित्र में देखिये रिंग बेल के अवशेष...



उत्खनन में प्राप्त हो रहे अन्य पुरावशेष.......






उत्खनन में तल्लीन,कहीं चूक हो जाये...


इतिहास को प्रगट करनें वाले मील के पत्थर ---श्री श्यामलाल,श्री हरिलाल ,श्री शेषमणि और श्री रामअनुज (सभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग से पिछले तीन दशकों से जुड़े है.)


इतिहास अनुसन्धान पर अपनी जबरदस्त पकड़ रखनें वाले टीम के दो सबसे बुजुर्ग सेनानी -श्री राम लखन और श्री राम खेलावन जो पिछले कई दशकों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के हर उत्खनन अभियान के साक्षी रहे है ..
इस पुरातात्विक अनुसन्धान के प्रति अपनी जिज्ञासा और उत्खनन स्थल का निरीक्षण करने अभी तक जिला कलेक्टर श्री गौरव दयाल,सिटी मजिस्ट्रेट श्री बाल मयंक मिश्र ,उपजिलाधिकारी मछलीशहर एस मधुशालिनी , क्षेत्राधिकारी श्री आनन्द कुमार, उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ.जे प्रसाद, उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशक डॉ राकेश तिवारी , इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर .जे .एन पाल सहित इतिहास -अनुसन्धान में रूचि रखने वाले काफी लोंगो ने उत्खनित स्थल का निरीक्षण किया है. प्रदेश के संस्कृति मंत्री श्री सुभाष पाण्डेय जी जिनका निवास भी मुंगराबादशाहपुर में ही है ,इस उत्खनन को लेकर अति उत्साह में है उन्होंने तीन बार उत्खनित स्थल का निरीक्षण किया और आगे के उत्खनन के लिए एक लाख रुपये अपने पास से सहायता देने की घोषणा कर दी है।
इस सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता है कि नदियों के किनारों पर बसे प्राचीन ब्यवसायिक पडाव जल यातायात की बहुलता के चलते कालान्तर में नगर में तब्दील हो गए.निश्चित रूप से सई नदी के समीप बसे इस नगर को प्राचीन काल में अपनी मनोहारी छटा के चलते इसका फायदा मिला हो तथा तत्कालीन भारत में जल यात्रा का यह महत्त्वपूर्ण पड़ाव रहा हो जहाँ ब्यापार -विनिमय में संलग्न ब्यापारी अपना पड़ाव बनाते रहें हों और जिस कारण यह नगर एक प्रमुख ब्यापारिक प्रतिष्ठान के रूपमें स्थापित रहा होगा .इस जनपद के सुदूरवर्ती स्थलों ,जहाँ आज भी आवागमन की बहुलता नहीं हुईहै ,वहां ऐसे साक्ष्यों की उपलब्धता अवश्य हो सकती है जिससे यह निश्चित रूप से सिद्ध किया जा सके कि प्राचीन भारत में जौनपुर ब्यापार का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव था इसके अलावा जनपद के पूर्वी ,पश्चमी एवं उत्तरी छोरों पर कुछ चुनिन्दा स्थल भी पुरातात्त्विक उत्खननों की प्रतीक्षा में हैं , जौनपुर के क्रमबद्ध इतिहास लेखन के लिए बगैर ठोस साक्ष्यों के ,संकेतक साक्ष्य आज भी बेमानी प्रतीत हो रहें हैं . आज तो पुरातत्व उत्खनन के लिए हमारे पास विकसित और समुन्नत तकनीक है ,यदि भविष्य में जौनपुर के चुनिन्दा स्थलों पर पुरातात्विक उत्खनन संपादित करवा दिए जाएँ तो उत्तर भारत का इतिहास ही नहीं अपितु प्राचीन भारतीय इतिहास के कई अनसुलझे सवालों का जबाब भी हमें यहीं से मिल जायेगा ।
फिलहाल बारिश के चलते उत्खनन कार्य में अवरोध हो रहा है ,अनुसन्धान की अगली गाथा फिर कभी......

बुधवार, 29 जून 2011

एपार जौनपुर - ओपार जौनपुर ..मादरडीह गांव के उत्खनन से खुल रहे अतीत के पन्ने




आज -कल पुरातात्विक उत्खनन को लेकर जौनपुर चर्चा में है. और हो भी क्यों न ,जौनपुर के अतीत के पन्नों को जानने की उत्सुकता हर किसी को है.जिला मुख्यालय से लगभग ५५ किलोमीटर दक्षिण -पश्चिम में मुंगराबादशाहपुर के पास स्थित यह गांव जनश्रुति के अनुसार कभी भर राजाओं के निवास का केंद्र था.लगभग किलोमीटर की परिधि में फ़ैली यह ग्राम-पंचायतआज भी टीले पर ही अवस्थित है.गांव के बीच में ही डीह-बाबा का स्थान भी है जहाँ आज भी हर बरस मेला लगता है,उनकी पूजा होती है और उन्हें ग्राम देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है.

इतिहास अनुसन्धान में अपनी उत्कट अभिलाषा के चलते मैं भी अपनी उत्सुकता नहीं रोक पाया और उत्खनित स्थल का निरीक्षण करनें निकल पड़ा क्योंकि जौनपुर के अतीत के पन्नों को जानने की उत्सुकता मुझे कई दशकों से रही है. मेरे लिए यह गौरव की बात थी की इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पुरातत्व विभाग में मेरे अग्रज रहे और अब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पुरातत्व विभाग में प्रोफेसर डा.अनिल कुमार दूबे के नेतृत्व में यह उत्खनन कार्य सम्पन्न हो रहा था. इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पुरातत्व विभाग में मेरे सहयोगी रहे और अब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पुरातत्व विभाग में रीडर डॉ दिनेश ओझा भी इसी अभियान में शामिल थे,यह मेरे लिए दुगुना उत्साह वाली बात थी.पुरातत्व सर्वेक्षण कर रही टीम के अगुआ डा.अनिल कुमार दूबे जी का कल ही फ़ोन आया कि बन्धु अब तो जाओ ...

(उत्खनित स्थल को दिखाते डॉ.दिनेश ओझा और डॉ शिवाकांत तिवारी)



यहाँ की मूर्ति के उत्खनन में कुषाण कालीन यक्ष देवता की मूर्ति प्राप्त हुई जिनकी पूजा उस काल में गांव अथवा नगर के रक्षक शक्तिशाली देवता के रूप प्रवेश द्वार पर होती थी।

( यक्ष देवता की मूर्ति के साथ प्रोफेसर अनिल कुमार दुबे)


प्रोफेसर अनिल कुमार दुबे ने बताया कि कुषाण काल में गांव के रक्षक के रुप में यक्ष देवता का प्रचलन था।जिनकी स्थापना प्राय: गांव के प्रवेश द्वार अथवा जलाशयों के किनारे की जाती थी। कुषाण काल में महिलाएं धनधान्य समृद्धि एवं संतानों की रक्षा हेतु यक्ष देवता की पूजा करती थीं। गांव के अन्दर यक्ष देवता की स्थापना नहींकी जाती थी।

सर्वेक्षण कर रही टीम को स्तूप के बगल बौद्ध विहार होने का संकेतक साक्ष्य मिल रहा है। बौद्ध भिक्षुओं को ठहरने के लिए कुषाण काल में बनी बौद्ध विहार की दीवाल के अवशेष मिले हैं।

डॉ.एके दूबे के अनुसार स्तूप के चारो तरफ से खुदाई किया गया। जिससे स्तूप होना प्रमाणित हो चुका था, लेकिनफिर भी अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई थी। वह अनिश्चितता भी समाप्त हो गई, जब स्तूप की निचली सतह परचल रहे उत्खनन कार्य में बौद्ध विहार की अवशेष दीवाल प्राप्त हो गई। यह बौद्ध विहार कुषाण काल में बौद्ध भिक्षुओंको ठहरने के लिए बनाया गया था। स्तूप के बगल में ही बौद्ध विहार बने होने से यह कहा जा सकता है कि यह बौद्धस्तूप है।

अब तक के उत्खनन से यह ध्वनित हो रहा है कि लगभग ढाई हजार वर्ष के आस-पास यहाँ नगरीय सभ्यता पुष्पित थी,संभव है की यह स्थान विशेष व्यापर -वाणिज्य का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव भी रहा हो .सब कुछ आगे प्राप्त होने वाले महत्त्वपूर्ण साक्ष्यों पर निर्भर करता है.फौरी तौर पर इतने कम अध्ययन पर कुछ कह पाना उचित नहीं है.एक बात तय है कि पक्का निष्कर्ष प्राप्त करनें में अभी कई वर्ष लगेंगे.दो सप्ताह के उत्खनन में जो कुछ प्रकाश में आया है उसका कालक्रम कुषाणकालीन संस्कृति को ही प्रतिबिंबित कर रहा है......

जारी.......................

रविवार, 20 मार्च 2011

मत करहूँ मलिनियाँ से यारी-----फाग गीत -चौताल

रंगों के त्यौहार होली की बहुत-बहुत शुभकामनाओं के साथ,अपनी पिछली पोस्ट के क्रम में आज फाग-गीत की एक विधा चौताल प्रस्तुत है.फगुआ गायनमें विशेष कर चौताल ( अर्द्ध तीनताल,दादरा,कहरवाऔर फिर अर्द्ध तीनताल ) का आनंद, क्या कहनें.आज इस पोस्ट में चौताल का एक पद ही शामिल किया गया है जिसको स्वर दिया है बाबू बजरंगी सिंह नें.इस गीत में नायिका अपने प्रिय से कहती है कि आप मलिनियाँ (फूल-माला देने वाली महिला ) से यारी मत कीजिये .उसके इन्तजार में आप फुलवारी में खड़े रहते हैं जो कि बहुत लज्जाजनक है और मेरे लिए शर्म की बात है।
इस फाग गीत के बोल हैं-----
मत करहूँ मलिनियाँ से यारी,बलम तोहें बरज-बरज हारी ,
रोज-रोज कर कवन प्रयोजन ,ठाढ़े रहत फुलवारी,
तब तुम केलि करत मालिनी संग,मैं तो मर गयी लजिया के मारी ,
मत करहूँ मलिनियाँ से यारी,बलम तोहें बरज-बरज हारी
अब बाबू बजरंगी सिंह के स्वर में सुनिए अवधी का परम्परागत आंचलिक फाग-गीत -चौताल --------



एक बार पुनः होली की ढेर सारी शुभकामनाओं सहित....




रविवार, 13 मार्च 2011

मैं तरुणी, हरि छोट जतन करिहों का....... (फाग गीत-उलारा)

फाग-रंग में रंगी मेरी पिछली पोस्ट और गत वर्ष की अपनी पोस्ट में मैंने फाग-गीत के विविध विधाओं पर चर्चा की थी.आज की पोस्ट फाग-गीत -उलारा से सम्बंधित है.इस आंचलिक फाग गीत में एक तरुणी की गहन पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति को चित्रित किया गया है.वह कह रही है कि मैं तरुणी हूँ और मेरा हरि (पति) अभी बालक है.उस पर उसकी ननद उसे चिढ़ा रही है तथा उससे कह रही है कि कटोरी में तेल और उबटन के साथ मालिश कर के जल्द अपने पति को बड़ा करे.ननद-भौजाई की नोक-झोक आंचलिक लोक गीतों में प्रमुखता से दृष्टब्य है.उसी का निदर्शन प्रस्तुत गीत में भी किया गया है.अवधी में रची-बसी इस रचना को हमारे जनपद के लोक गायक प्रज्ञा-चक्षु बाबू बजरंगी सिंह बहुत मन से गाते हैं .अब गांवों में भी इस प्रकार की गायकी-बोल कम ही सुनायी पड़ते हैं क्योंकि आधुनिकता की बयार अब वहाँ भी पहुँच चुकी है ।
अब पहले बाबू बजरंगी सिंह के स्वर में सुनिए अवधी का परम्परागत आंचलिक फाग-गीत -उलारा --------



इस फाग गीत के बोल हैं------
करिहौं का का यार -मैं तरुणी, हरि छोट जतन करिहों का
गऊँवा गोयाड्वा आयल बरतिया हे रामा हो हुलसे मन मोर ,
सैंया के देखल गदेलवा -जिया जरि मोर ......
मैं तरुणी, हरि छोट जतन करिहों का......
लहुरी ननदिया ताना मारे हे भौजी तोहरौ हरि छोट ,
हाथे में लईला बुकौवा -कोसिया भर तेल ,
चढ़ी जा बालम सेजरिया -मलि करिदै सयान-
मैं तरुणी, हरि छोट जतन करिहों का.....
बड़े बाग़ में पड़ा बिछौना हे रामा हो ,
तकिया मखमौल ,ता पर पिय मोरा सोवै -अंखिया रतनार -
मैं तरुणी, हरि छोट जतन करिहों का....
......................................................................................................
अब अगली सामयिक पोस्ट में फिर फागुनी चौताल के साथ भेंट होगी...






बुधवार, 9 मार्च 2011

बिन बलमा फगुनवा जहर लागेला ......

फागुन फिर आ गया है . गाँव में बसंत पंचमी से फागुनी बयार बह रही है. मुझे गर्व होता है कि कुछ लोग आज भी लोग इस जीवन्तता को कायम किये हुए है,भले ही परिवर्तन का एक नया दौर आ चुका है-लेकिन इस डिजीटल युग में भी हम सब को मौसमों के आने -जाने का एहसास बखूबी होता रहता है.गांव-घर मदनोत्सव का दौर प्रारंभ हो चला है जो कि होली के बाद आठ दिनों तक चलेगा . शाम हुई नहीं कि कहीं ना कहीं ढोल के साथ मंडली बैठ गयी .वैसे भी अवधी की एक कहावत है कि इस फागुन महीने में मदन देव की कृपा से आदमी क्या पेड़ भी नंगे हो जाते हैं. जनपद के विख्यात लोक कवि स्वर्गीय पंडित रूपनारायण त्रिपाठी जी के शब्दों में-
जहाँ फूले न फागुन में सरसों ,
जहाँ सावन में बरसात न हो |
किस काम का है वह गाँव जहाँ ,
रसजीवी जनों की जमात न हो |

-------------------------------
नशा मौसम का सबके लिए है ,
तुझको कुछ और हुआ तो नहीं |
तन में फगुआ न समा गया हो ,
मन में टपका महुआ तो नहीं |

----------------------------------

गत वर्ष फाग -गीतों की एक श्रृंखला मैंने शुरू की थी -उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज फिर यह पोस्ट प्रस्तुत है.
हमारे जौनपुर जनपद के बदलापुर तहसील के गांव बुढ्नेपुर निवासी
प्रज्ञा चक्षु बाबू बजरंगी सिंह जनपद के प्रतिष्ठित लोक -गीत गायक माने जाते हैं .नेत्रहीन होने के बावजूद संगीत के प्रति गहरी उनकी आस्था नें लोकगीत गायन के प्रति उन्हें प्रेरित किया.इनके पास श्रवण-परम्परा से प्राप्त लोकगीतों का अद्भुत संग्रह है.


आज फाग-गीत गायन के सम्राट प्रज्ञा चक्षु बाबू बजरंगी सिंह के स्वर में सुनिए अवधी का परम्परागत आंचलिक फाग-गीत ......




डाऊनलोड

इस फाग गीत के बोल हैं-------
कोयल कूक से हूंक उठावे -धानि धरा धधकावे हिया में ,
पपिया पपीहा रतिया के सतावे -फूलत हैं सरसों -सरसों ,
घर कंत न होत बसंत न आवत।
बिन बलमा फगुनवा जहर लागेला।
बिरहिणी आम बौर बौरायल ,
बन तन आग पलाश लगावत ,
पिय घर सबही सुघर लागेला ,
बिन बलमा फगुनवा जहर लागेला
कोयल कूक हूक उदगारत ,
शीतल मंद मलय तन जारत ,
चातक शशि जैसे सर लागेला ,
बिन बलमा फगुनवा जहर लागेला..
फगुनवा आयल रे दैया ,
एक तो उमरिया के बारी रे -पियवा परदेश,
रहि-रहि के मारत कटारी ,
जिया बौराइल रे दैया
फगुनवा आयल रे दैया ,
मारे श्रृंगार हार-रंग रोरी ,
सजनी सोहाइल मोको मंगल होरी ,
गले डाले रुमाल-गले डाले रुमाल-
होली न खेलब सैंया तले
सैंया के मोहन माला हो हमरो चटकील ,
दूनौ के बनिहय गुदरिया,
सुमिरब दिनरात -सुमिरब दिनरात -
होली न खेलब सैंया तले ।
सैंया के शाला दुशाला हो -हमरे गर हार ,
दूनौ क बनिहै सुमिरिनी ,
होई जाबे फकीर -होई जाबे फकीर -
होली न खेलब सैंया तले ।
चातक-शशि विषधर लागेला हो-
बिन बलमा फगुनवा जहर लागेला

यकीन मानिये जो रस इन परम्परागत फाग गीतों में हैं वह आज-कल बज रहे फूहड़ गीतों में नहीं है .अगली सामयिक पोस्ट में एक फागुनी उलारा के साथ फिर मुलाकात होगी--------