बुधवार, 9 मार्च 2011

बिन बलमा फगुनवा जहर लागेला ......

फागुन फिर आ गया है . गाँव में बसंत पंचमी से फागुनी बयार बह रही है. मुझे गर्व होता है कि कुछ लोग आज भी लोग इस जीवन्तता को कायम किये हुए है,भले ही परिवर्तन का एक नया दौर आ चुका है-लेकिन इस डिजीटल युग में भी हम सब को मौसमों के आने -जाने का एहसास बखूबी होता रहता है.गांव-घर मदनोत्सव का दौर प्रारंभ हो चला है जो कि होली के बाद आठ दिनों तक चलेगा . शाम हुई नहीं कि कहीं ना कहीं ढोल के साथ मंडली बैठ गयी .वैसे भी अवधी की एक कहावत है कि इस फागुन महीने में मदन देव की कृपा से आदमी क्या पेड़ भी नंगे हो जाते हैं. जनपद के विख्यात लोक कवि स्वर्गीय पंडित रूपनारायण त्रिपाठी जी के शब्दों में-
जहाँ फूले न फागुन में सरसों ,
जहाँ सावन में बरसात न हो |
किस काम का है वह गाँव जहाँ ,
रसजीवी जनों की जमात न हो |

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नशा मौसम का सबके लिए है ,
तुझको कुछ और हुआ तो नहीं |
तन में फगुआ न समा गया हो ,
मन में टपका महुआ तो नहीं |

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गत वर्ष फाग -गीतों की एक श्रृंखला मैंने शुरू की थी -उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज फिर यह पोस्ट प्रस्तुत है.
हमारे जौनपुर जनपद के बदलापुर तहसील के गांव बुढ्नेपुर निवासी
प्रज्ञा चक्षु बाबू बजरंगी सिंह जनपद के प्रतिष्ठित लोक -गीत गायक माने जाते हैं .नेत्रहीन होने के बावजूद संगीत के प्रति गहरी उनकी आस्था नें लोकगीत गायन के प्रति उन्हें प्रेरित किया.इनके पास श्रवण-परम्परा से प्राप्त लोकगीतों का अद्भुत संग्रह है.


आज फाग-गीत गायन के सम्राट प्रज्ञा चक्षु बाबू बजरंगी सिंह के स्वर में सुनिए अवधी का परम्परागत आंचलिक फाग-गीत ......




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इस फाग गीत के बोल हैं-------
कोयल कूक से हूंक उठावे -धानि धरा धधकावे हिया में ,
पपिया पपीहा रतिया के सतावे -फूलत हैं सरसों -सरसों ,
घर कंत न होत बसंत न आवत।
बिन बलमा फगुनवा जहर लागेला।
बिरहिणी आम बौर बौरायल ,
बन तन आग पलाश लगावत ,
पिय घर सबही सुघर लागेला ,
बिन बलमा फगुनवा जहर लागेला
कोयल कूक हूक उदगारत ,
शीतल मंद मलय तन जारत ,
चातक शशि जैसे सर लागेला ,
बिन बलमा फगुनवा जहर लागेला..
फगुनवा आयल रे दैया ,
एक तो उमरिया के बारी रे -पियवा परदेश,
रहि-रहि के मारत कटारी ,
जिया बौराइल रे दैया
फगुनवा आयल रे दैया ,
मारे श्रृंगार हार-रंग रोरी ,
सजनी सोहाइल मोको मंगल होरी ,
गले डाले रुमाल-गले डाले रुमाल-
होली न खेलब सैंया तले
सैंया के मोहन माला हो हमरो चटकील ,
दूनौ के बनिहय गुदरिया,
सुमिरब दिनरात -सुमिरब दिनरात -
होली न खेलब सैंया तले ।
सैंया के शाला दुशाला हो -हमरे गर हार ,
दूनौ क बनिहै सुमिरिनी ,
होई जाबे फकीर -होई जाबे फकीर -
होली न खेलब सैंया तले ।
चातक-शशि विषधर लागेला हो-
बिन बलमा फगुनवा जहर लागेला

यकीन मानिये जो रस इन परम्परागत फाग गीतों में हैं वह आज-कल बज रहे फूहड़ गीतों में नहीं है .अगली सामयिक पोस्ट में एक फागुनी उलारा के साथ फिर मुलाकात होगी--------

24 टिप्‍पणियां:

  1. सच कहा जो रस इन गीतों मे है वो आजकल के गीतों मे कहाँ। धन्यवाद इस गीत के लिये---

    धूम मची चारों तरफ होली का त्यौहार
    कौन करे बिन साजना रंगों की बौछार
    धन्यवाद।

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  2. वाह,

    माने अब गाँव में चउचक अंदाज में फागुन आ पहुंचा है.....बसंती बयार के मस्त माहौल को इन लोक गीतों ने एक अलग ही किस्म की पहचान दी है। गीत और उसकी देशज शैली मन मोह गई।

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  3. बहुत खूब आनंद आ गया मनोज भाई !
    गाँव छोड़े बरसों हो गए , होली का जो आनंद फाग गीतों के बीच आता था आज कहीं महसूस नहीं हो पाता !

    हार्दिक आभार आपका इस बढ़िया पोस्ट के लिए !

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  4. अब तो फागुन आ गया है..फिर होली की मस्ती...अच्छा लगा यह पोस्ट पढ़कर.

    'पाखी की दुनिया' में भी आपका स्वागत है.

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  5. मजा आ गया गीत सुनके...
    आजकल तो होली के लोकगीतों के नाम पर बाजार में अश्लील गीतों की भरमार है...

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  6. रोचक।
    इन गीतों से मानसिक सुख मिलता है।

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  7. बहुत खूब ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  8. फिर वो गाँव का माहौल याद आ गया । बढ़िया प्रस्तुति ।

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  9. नशा मौसम का सबके लिए है ,
    तुझको कुछ और हुआ तो नहीं |
    तन में फगुआ न समा गया हो ,
    मन में टपका महुआ तो नहीं
    छा गए आप तो बधाई

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  10. बाबू बजरंगी सिंह जी के प्रभावी स्वर में आप ने बहुत ही सरस फाग -गीत सुनवाया .ऐसे गीत पहले कभी आकाशवाणी पर ही सुना करते थे आभार.

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  11. वाह आज पहली बार असली फ़गुनाहट महसूस हुई है, बहुत आभार आपका.

    रामराम.

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  12. बिन बलमा फगुनवा जहर लागेला -वाह रे बाबू बजरंगी सिंह -
    एक गहन पीड़ा की कितनी मार्मिक अभिव्यक्ति !

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  13. बजरंगी बाबु को गत वर्ष भी सुना था आपके ब्लॉग पर।
    होली के फ़ाग का ठेठ देशी अंदाज मन को भा गया। वैसे भी फ़ूहड़ एलबमों ने सत्यानाश कर रखा है।

    मनोज जी, प्रस्तुति करण के लिए आपका आभार

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  14. वाह जी बहुत सुंदर, गीत बहुत अच्छा लगा, धन्यवाद

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  15. बहुत बढ़िया .... इन गीतों में अलग ही कशिश होती है .....

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  16. दिल सुनकर पूर्णरूपेण आल्हादित हो गया और गीत के बोल तो बहुत ही सुंदर हैं.

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  17. Manoj ji
    I could not help remembering you and your blog, lost year's posts with the first knock of Fagun.This time your new post and the 'Faguaa' altogher have taken me to my land -Eastern U.P. You made me feel at my paternal home. I am not an expert, but have my 'hastakshep' in folk music. Now you can understand how much I have enjoyed! If you please meet Babu Bajrangi Singh, please convey my regards and 'Namskaar' to him. Waiting for new Fags,Ulaara and a Chaita.

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  18. बहुत बढ़िया लगा सर अहसास हुआ की होली बस आ गयी है

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  19. अहा! मजा आ गया...हम तो पिछले बरस वाला भी न जाने कितने बार सुन चुके हैं आपकी आवाज में...फिर इन्तजार रहेगा..

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  20. क्या ख़ूब गीत हैं भाई, इन पर अच्छा हुआ नज़र पड़ गई। क्या बात है पंडितजी वाह वाह।

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आपकी टिप्पणियाँ मेरे ब्लॉग जीवन लिए प्राण वायु से कमतर नहीं ,आपका अग्रिम आभार एवं स्वागत !