बुधवार, 18 मार्च 2009

अब बंद हुई ढोल की थाप

आज चैत मास की अष्टमी है | गाँव में बसंत पंचमी से चल रहा धमाल आज से एक साल के लिए शांत हो जायेगा | पूर्वी उत्तर प्रदेश के उन गाँव की बात मैं कर रहा हूँ जहाँ आज भी इस डिजीटल युग में जीवन्तता कायम है | जहाँ मौसमों के आने -जाने का एहसास होता है | मदनोत्सव का दौर पूरे महीने भर चलता है | शाम हुई नहीं कि कहीं ना कहीं ढोल के साथ मंडली बैठ गयी | ये और बात है कि कोई कुछ खाने के लालच में बैठा है -तो कोई गाने के लालच में ,लेकिन शौकीन लोग बैठेंगे जरूर | साल भर का भडास एक माह में निकल गया |अब फसलों को सुरछित घर पहुचने की चिंता का दौर शुरू होगा |इस एक महीने में बुरा मानों होली की आड़ लेकर ढोल की थापों के बीच कई बेचारों की झोपरीयाँ खाक में मिला दी जातीं है |यह इस मदनोत्सव का सबसे नकारात्मक पहलू होता है जो कि पता नहीं कब से चल रहा है और पता नहीं कब तक चलेगा |इस मदनोत्सव के विविध रूपों का दर्शन हमारे पूर्वांचल के लोकगीतों में मिलता है ,जैसे मदनोत्सव के चरम होली के आस-पास का वर्णन गीतों में इस तरह है कि -फूले कन्चनारावा बयार बहे फागुनी - उड़त है चुनरिया झकोरा खाए झुलनी -लोटवा क पनिया बहावे दुलहिनिया क् बाबा अब लाग बा फगुनवा ना |
और चैत मास में स्वर और बोल बदल जातें हैं |उल्लास की जगह अंततः चिंता की लकीरें दिखाई पड़तीं है ,जैसे -
गेहूँ की बालियाँ में मोतिया क् दनवा, कतहूँ घुन घुनवा बजाये रहे चनवा ,खेतवा के मडवा पे बिहसे किसनवा कि गंगा माई तोहरा करब दरसनावा जौ भरि जाए कुठिला अंगनवा ना |
चूँकि अब एक साल तक फागुन -मदनोत्सव आदि की चर्चा आज से बंद हो जायेगी इस लिए चलते -चलते पूर्वी उत्तर प्रदेश के विख्यात लोक कवि स्वर्गीय पंडित रूपनारायण त्रिपाठी जी की फागुन की इन लाइनों से आपको परिचित कराना चाहूँगा कि -
जहाँ फूले न फागुन में सरसों ,
जहाँ सावन में बरसात न हो |
किस काम का है वह गाँव जहाँ ,
रसजीवी जनों की जमात न हो |
विधना कवि को वह छाव न दे ,
जहाँ रूह से रूह की बात न हो |
जहाँ रात न होती हो मालवा सी ,
जहाँ काशी की भाति प्रभात न हो |


कहीं तेरी खुशी के लिए तुझको ,
किसी साधु ने दी है दुआ तो नहीं |
सहसा तुझको नवयोवन की ,
मधुपाई हवा ने छुआ तो नहीं |
नशा मौसम का सबके लिए है ,
तुझको कुछ और हुआ तो नहीं |
तन में फगुआ न समां गया हो ,
मन में टपका महुआ तो नहीं |

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया लेख ! कविता की तो बात ही क्या है !
    घुघूतीबासूती

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  2. वाह बहुत ही सुंदर ढंग से आप ने अपने लेख मै फागुन के रंग भर दिये, बहुत अच्छा लगा पढ कर.
    धन्यवाद

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  3. दरअसल रूप नारायण जी की कविताओं का तरन्नुम में सुनना ताउम्र जीवन का एक अलग अनुभव है -मैंने पहले भी आग्रह किया था की उनकी कविआतों को तरन्नुम में सुनाओ -!
    शीर्षक पढ़ कर जी धक् से रह गया -कहीं चौताल सम्राट बंशराज ......ईश्वर उन्हें लम्बी उम्र दे !

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  4. aanchalik cheezon ki baat hi kuch air hai apni likhi kavit ka ek sher udrith karna chaahoonga:

    gaon uple jharne sarson aur wo pagdandiya,
    meri to himmat nahi, khush rahoon wo bhoolkar.

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  5. तन में फगुआ न समां गया हो ,
    मन में टपका महुआ तो नहीं |
    अद्भुत शब्द....बेमिसाल...वाह...आभार आपका इस प्रस्तुति का और आपने क्या खूब कहा है की " पूर्वी उत्तर प्रदेश के उन गाँव की बात मैं कर रहा हूँ जहाँ आज भी इस डिजीटल युग में जीवन्तता कायम है | जहाँ मौसमों के आने -जाने का एहसास होता है " अगर ये गाँव ना हों तो पता ही न चले की कब फागुन आया और चला गया...
    नीरज

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  6. अरे वाह, मजा आ गया। होली है।
    जाकिर

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  7. गेहूँ की बालियाँ में मोतिया क् दनवा, कतहूँ घुन घुनवा बजाये रहे चनवा ,खेतवा के मडवा पे बिहसे किसनवा कि गंगा माई तोहरा करब दरसनावा जौ भरि जाए कुठिला अंगनवा ना ...waah ji waah bhot khoob....!!

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  8. डिजीटल युग में जीवन्तता कायम है
    -इस एक पंक्ति में आप ने बहुत कुछ कह दिया.
    सच है कितने ओपचारिक होते जारहे हैं हम सभी.
    -किस काम का है वह गाँव जहाँ ,
    रसजीवी जनों की जमात न हो '

    बहुत ही सुन्दर गीत से परिचय कराया.
    'माटी की खुशबू लोक गीतों से ही आती है.

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  9. AGAR MAIN ..........AAJKAL KE HISAB SE KAHOON,

    BADAL DOON TO

    TAN ME MAHUA ,MAN ME FAGUA TO ?

    THODA HASYA KA MAN HO AAYA .

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  10. फ़िर वही फ़रमाइश-इसे अपनी आवाज में पेश करें।

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