शुक्रवार, 27 मार्च 2009

अवकाश प्राप्ति के बाद का दर्द .(एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी की जुबानी )


कल मेरे विश्वविद्यालय में महामहिम राज्यपाल जी आये थे ,अवसर था दीछांत समारोह का .मेरे ऊपर मीडिया का और अतिथियों को आमंत्रित करने और उन्हें ससम्मान बिठाने का दायित्व था .इसी बीच फुर्सत के छ्णों में मुझसे एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी मिले (अब अवकाशप्राप्त )जो मेरे एक मित्र के बहुत करीबी हैं .बात ही बात में उन्होंने अपनी जो पीडा बताई उससे मैं हतप्रभ रह गया कि आज कल कैसे -कैसे हालत समाज के सामने प्रस्तुत हो रहें हैं और हम सब किस दिशा कि ओर जा रहें हैं .उनके साथ वार्तालाप में जो कुछ उन्होंने बताया , उसे उसी रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ , उन्होंने कहा कि -
हमने जीवन में बहुत संघर्ष किया ,जब छोटा था तो१८ कीलोमीटर दूर -दूर तक इस इलाकें में कोई स्कूल न था ,माँ कहती थी कि अपने बेटवा के चाहे कैसे भी हो हम स्कूल भेजब . परिवार क्या दूर -दूर तक किसी गाँव में कोई भी मिडल स्कूल के ऊपर पढा नहीं था ,खैर माता जी का संघर्ष और मेरे स्कूल जाने को लेकर माता जी ही द्वारा किया जाने वाला आमरण अनशन रंग लाया और मेरे दादा जी और पिता जी ने माता जी की वह मांग बहुत दुखी मन से मान ली .मैं १८ किलोमीटर दूर स्कूल जाने लगा .दादा जी मुझे ऊंट पर बैठा कर स्कूल ले जाते थे और लगातार ३ सालों तक यही सिलसिला चलता रहा कि मुझे ऊंट से ले जाना और दादा जी का दिन भर स्कूल में ही रुकना और शाम को छुटी होने पर मुझे फिर ले आना .मेरे घर का पूरा माहौल केवल मेरे स्कूल जाने आने ही तक सिमट गया था .क्लास ८ के बाद मुझे आगे की पढाई के लिए और दूर जाना था और रास्तें में एक नदी पार करना था ,तब उस घाट पर नाव भी नहीं होती थी .मेरे साथ पूरे गाँव से केवल दो ही बच्चे थे .खैर जैसे तैसे नदी तक दादा जी फिर जाते मेरे साथ नदी तैर कर उस पार जाते और तब तक नदी के घाट पर बैठे रहते जब तक मै पुनः वापस न आजाता. यही क्रम साल भर चलता रहा और जब घर वालों को लग गया कि मैं अब नदी पार करने और आने-जाने में माहिर हो गया हूँ तब जाकर मुझे अकेले आने -जाने की छूट मिली .इतना लम्बा स्कूल का रास्ता आने जाने में मेरे पावं दुखते थे .मेरी मां रात में मेरे पैरों में सरसों का तेल लगाती, मेरे पैर दबाती और फिर रोज स्कूल जाने और मेहनत से पढने के लिए प्रेरित करती .उन दिनों मुस्किल से रात को थोड़ी देर के लिए दीपक मिला करता था ,पूरी पढाई तो सुबह ब्रह्म मुहूर्त में ही दादा जी के साथ ही होती थी .
इसी तरह हाई-स्कूल और फिर इंटर -करने के बाद बी ए करने की बात आयी ,मेरे दादा जी को मेरे कॉलेज के प्रिंसिपल साहब ने बताया कि आप का बच्चा बहुत होनहार है इसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भेजिए .इलाहाबाद हमारें यहाँ से १२५ कीलोमीटर दूर था .घर में कई दिन लम्बी बहस हुई जो कि इलाहाबाद में रहने पर होने वाले खर्च तथा घर से दूर जाने को लेकर था .मेरी माँ चाहती तो थी ,लेकिन मेरी जुदाई उनके लिए बर्दास्त के बाहर थी . बाहर पढने के लिए पैसे भी नहीं थे ,थोड़ी सी जमीन थी जिसमें खेती होती थी जीवन यापन के लिए परिवार बडा था ,पैसा कमाने का कोई और साधन न था उसी में से थोड़ी जमीन कलेजे पर पत्थर रख कर मेरे दादा जी ने गाँव में ही किसी को बेच दिया और अंततः मेरे पढाई के लिए येन- केन -प्रकारेण ,पैसे की ब्यवस्था हो गयी .खैर वह दिन भी आया जब मैं माँ के भींगे और नम आंसूओं के बीच इलाहाबाद आ गया .घर की जिम्मेदारी को समझते हुए मैंने अपने आपको पढाई में झोंक दिया ,बी ए ,फिर एम् .ए और अंत में वह दिन भी आया जब मैं उच्च सेवा के लिए चुना गया .
नौकरी में आने के बाद से लेकर अवकाश प्राप्ति तकमैंने केवल और केवल सबका ऋण ही अदा किया .आज उसी १८ किलोमीटर के दायरें में ५० से भी अधिक स्कूल हैं .नदी पर पुल बन गया है .घर ही नहीं पूरे गाँव की तस्वीर बदल गयी .नौकरी के दौरान मैं केवल सब कुछ ठीक ही करता रहा ,घर ,जमीन , सब कुछ ,परन्तु जब आज रिटायर हो गया हूँ तो आज उसी परिवेश में मेरे लिए कोई जगह नहीं बची है .जिस महल सरीखे घर को मैंने एक -एक पाई जोड़ कर बनाया आज उसी घर में मेरे लिए कोई कमरा नहीं है .हर ब्यक्ति अपने ढंग से जीना चाहता है घर की पुरानी गरीबी नही किसी ने देखा है और न ही कोई उस पर चर्चा करना चाहता है और तो और मेरे अपने बच्चे भी उसको बोरिंग कह कर अपने ढंग से जीना चाहतें हैं .आज उनका कहना है पापा आपनेपैसा क्यों नहीं कमाया क्यों अकेले हरिश्चंद्र की औलाद बनना चाहतें थे .जब मै समाज सेवा करना चाहता हूँ तो उसमें भी लोग लोग केवल पैसा चाहतें है ,जब अपने अकेलेपन को दूर करने को कोई ब्यवसाय करना चाहता हूँ तो ५० लाख के नीचे का कोई प्रस्ताव नहीं आता .लोग कहतें हैं की क्या मजाक करतें हैं आप के पास पैसे की क्या कमी होगी .अब इन लोंगों को कौन समझाए की मैं एक सरकारी सेवक रहा हूँ मैंने पूरी इमानदारी के साथ सेवा की ,अपनी शुचिता बनाये रखी और जो कुछ जोड़-जोड़ कर बनाया वह भी घर बनाने में ही लगाया .घर पर बहनों , बेटी -बेटा ,भतीजा -भतीजियों की शादी की इसके बाद भी लोग अभी दुखींहैं कि मैंने क्या किया ?.उन्होंने कहा कि पूरे सर्विस के दौरान नौकरों की लाइन लगी रही .एक काम कहा तो दस नौकर -ड्राईवर हाजिर .आज घर में मेरी पत्नी ही खाना बनाये तभी मुझे खाना मिलेगा और अपनी कार मुझे ही चलाना है क्यों कि अब न तो ड्राईवर है और न ही मेरे लायक कोई ड्राईवर मुझे दीखता है .मेरा बेटा -बहू घर के बाहर नौकरी में और बेटे के ससुराल वाले मेरे घर में जमे पड़ें हैं .
उन्होंने कहा कि इससे बेहतर होता कि मै सर्विस के दौरान ही समाज से जुडा होता ,उनके सुख दुःख में भागीदार रहा होता तो कम से कम समाज तो आज इस तन्हाई में मेरे साथ होता .उन्होंने यह भी कहा कि मैं अपने परिचित लोंगों से यही सलाह देंता हूँ कि भइया अगर रिटायर होने से १० साल पहले से ही अपनी रिटायर होने के बाद वाली ब्यवस्था पर ध्यान नहीं दिए तो कहीं के नहीं रहेंगे क्योंकि उस समय न तो आपके साथ प्रशासन होगा ,न चौकीदार ,न नौकरों की फौज और न ही हाँथ जोड़े सत्ता के साथ रहनेवाले नेता या दलाल .सबके सब केवल आप के साथ नौकरी तक हैं .नौकरी के बाद वही रहेगा जिसे आपने बोया है .इसलिए यदि अकेलेपन से बचना है तो आज ही से शुरुआत कीजिये .
मैं इस सच को सुन कर दुखी हो गया ,आज समाज किस दिशा की ओर जा रहा है .क्यों सारी मान्यताएं टूट रहीं हैं ,कौन रोकेगा इन्हें ,क्या कही विश्राम है कि यूँ ही चलेगा यह सब .जिस महान देश मैं बड़े -बड़े महापुरुष जन्म लिये हों .जहाँ माता को पृथ्वी और पिता को आकाश से बडा दर्जा हो ,जहाँ सर्वे भवन्तु सुखिनः का उदघोष हुआ हो ,जहाँ माता -पिता ,गुरुओं ,साधुओं ,वृद्धों ,बालकों का सम्मान सर्वोपरि रहा हो उस देश में -समाज में -परिवार में हों रहीं ऐसी घटनाएँ हमें लज्जित और केवल लज्जित करतीं हैं .

18 टिप्‍पणियां:

  1. विचारों का मंथन शुरू हो गया है ।

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  2. ऐसे कई सरकारी-ग़ैर सरकारी अफ़सरों को मैं भी जानता हूं. लेकिन ईमानदारी की थाती भी कहीं जाती नहीं है. अगर वह चमचों और फ़ालतू के रोब-दाब की अपेक्षा न करें तो मुझे नहीं लगता कि उनके लिए दुखी होने का कोई कारण होगा. कम से कम सुकून तो होगा ही.

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  3. अच्छा लेख ! अवकाश प्राप्ति के बाद के एकांत और निर्वासन की पीडा का अनुमान इस वर्णन से आसानी से किया जा सकता है ! मेरा मानना है कि जीवन में नौकरी के अलावा किसी अन्य सामाजिक् साहित्यिक या सांस्कृतिक कार्य भी करते रहना चाहिए जिससे सेवानिवृति के बाद जीवन पूर्वत सक्रिय रहे ! निराशा , अवसाद और पश्तावे से बचने का यह सही तरीका हो सकता है !

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  4. इन साहब ने शुचिता से जीवन व्यतीत किया, सरकारी साधनों की आदत हो गई, किन्तु लोगों से दूरी बना कर रख ली। जीवन्त संबंध बनाए होते तो यह अकेलापन न होता।

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  5. नववर्ष की शुभकामनाएँ।
    आपने जो वर्णन किया है वैसी स्थिति से हमारे माता पिता की पीढ़ी प्रायः गुजरी थी। परन्तु यहाँ इन व्यक्ति को ही इस स्थिति को झेलना पड़ रहा है। संताप होना स्वाभाविक है। किन्तु यदि वे अपने द्वारा दिया गया वापिस लेने की स्थिति में नहीं हैं तो उन्हें सरकारी पैंशन से अपने लिए जीते हुए अपने मन पसंद काम करते हुए अब जीना चाहिए। केवल अपने व अपनी पत्नी के लिए।
    अवकाश प्राप्ति का समय आँखों पर से पट्टी हटाने का सा होता है। यदि आने वाले समय की आहट सुन हम पहले से ही समस्याओं से जूझने के लिए अपने को तैयार कर लें तो बेहतर रहेगा। यह समय एक metamorphosis की तरह का समय होता है।
    संयोग से आज ही मैंने भी इस विषय से सम्बन्धित >लेख लिखा है।
    घुघूती बासूती

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  6. सोचने को विवश करता है आपका लेख.........
    पर मुझे लगता है इमां दारी से काम करने वाला अंत में संतुष्ट ही रहता है

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  7. अकेलेपन का यह त्रास बहुत डराता है ..पर लगता है कि आज कल के समय को देखते हुए पहले ही कुछ इस प्रकार की व्यवस्था कर लेनी चाहिए की यह पीडा नहीं सहनी पड़े ..

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  8. अब इस अतीत रुदन से क्या हासिल होगा -क्या नौकरी के दौरान इन बातों पर गौर नहीं किया था -तब तो सुविधाजन्य लापरवाही /मदहोशी में दिन कट गए और अब समाज से जुड़ना चाहते हैं !
    अभार्हाल ईश्वर उन्हें शान्ति प्रदान करे !

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  9. Badalte Samajik parivesh mein nishit hi aaj Natikta mein giravat aati ja rahi hai.Atit ki yadon ko samjhana aur itne sahag aur marmik rupe mein likhne ke liye nischaye hi manviya samvedana aavashyak hai, jiske liye aap nischay hi khare hain. AAp ke lekhani se nikle sabdon ke intezar mein ek..........prashashak.

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  10. कही ना कही इन महाश्य की भी गलती है, पहले दफ़तर के कर्मचारियो को घ्र क नोकर बना कर रखने होगें, बच्चो को कोई ससंकार तो क्य उन्हे समय ही नही दिया होगा, ओर अब, लेकिन अब भी जो पॆंशन मिलती है उस मै ही मस्त रहे, बच्चो को भी मस्त रहने दे, पहले अफ़सरी की अकड मै किसी को नही बुलाते होगे.... अब लोग इन्हे नही बुलाते होगे... यह समय हम सब पर अयेगा, लेकिन अगर हम अपने बच्चो को सही शिक्षा दे, उन को समय दे तो , वो भी जरुर हमे भी अपना सारा नही तो कुछ समय जरुर देगे, ओर हम सब को ऎसी घटना से जरुर सबक लेना चहिये..
    धन्यवाद

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  11. वाह वाह मिश्रा जी, ख़ूब आलेख है । एकदम फिट बात । मगर इन्हें हमारे पिताजी से मिलवाना पड़ेगा जो १० साल पहले रिटायर होकर भी रिटायर नहीं हुए। हा हा । हम भाग्यशाली न कहे गये फिर ?

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  12. बिल्कुल सही कहा आपने अगर सामाजिक दायरा होता तो शायद इतनी तकलीफ़ नहीं होती, पर अधिकतर अधिकारी वर्ग समाज को इस नजर से देखता है कि वो लोग केवल उनका फ़ायदा उठाना चाहते हैं, न कि समाज में जगह बनाना चाहते हैं, और अगर कोई अधिकारी अपने प्रभाव का उपयोग कर मदद कर भी दे तो कोई बुरा तो नहीं। आखिरकार दुनिया का हर रिश्ता लेन-देन प्रणाली पर ही निर्भर है।

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  13. ईमानदारी का दर्प और समाज से कटने का दर्द - हमने भी यही कमाया है। आगे क्या होगा? पता नहीं।

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  14. Attal Satya Hai. Imaandaari se bhi kaam karte hue bhi apan bhavishye ka to dekhna he chahiye aur sath he apne bacchon ke sanskaar bi.

    Aprat from that, there are many social working organisations were money is not required and their missions are genuine. I am sure Mishra ji you are aware of them, I hope you can guide that gentleman. Vaanprasthiyon ki samaj ko bahut jaroorat hai.

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  15. @ निश्चित रूप से पुनः उनसे मिलने पर आपकी बात को उन तक पहुचानें की कोशिश करूंगा .

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  16. अगर समय और पैसे कि फ़िकर छोड्कर अपने परिवेश के लोगो के लिये भि समय निकाला जाये तो सेवारत के बाद आवकाश प्राप्ति का मजा १० गुना हो जाता है. !!

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  17. Ye behad sach hai...harek ko apne bhavishya ke baareme ,eemandaareeke saath avashy sochnaa chahiye.
    Aapka "Pahadon"pe likha sachitr lekhbhee padha...afsos ke insaan prakrutee kee den ko istarah nasht kiye jaa rahe hain...!

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  18. एक काम कहा तो दस नौकर -ड्राईवर हाजिर के साथ ईमानदारी का रोना एक नौकरशाह ही रो सकता। मैंने किसी के माध्यम से लिखा है- ईमानदारी गर्व का विषय नहीं है। यह तो नौकरी की अनिवार्य आवश्यक्ता है।

    वैसे उनका कष्ट सुनकर दुख भी है।

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