शनिवार, 6 जून 2009

अनोखा है राउर बाबा क मेला .



हमारा देश भी कितनी विचित्रताओं ,लीलाओं और परम्पराओं के साथ जी रहा है .प्रगतिवादी विचार धारा के लोंगों को बकवास भले ही लगे लेकिन इस महान देश में बहुत ऐसे लोग हैं जिन्हें केवल श्रद्धा और विश्वास के अलावा और कुछ सोचनें के लिए नहीं है .आपको यह विचित्र किन्तु सत्य घटना से दो -चार कराता हूँ .हमारे जौनपुर जनपद में ही मई ग्राम पंचायत के अर्न्तगत एक अनोखा स्थान है ,वह है राउर बाबा की ऐतिहासिक सिद्ध पीठ , जहाँ केवल साल में एक बार लोग गंगा दशहरा के आस-पास दिनों के लिए भारी संख्या में जुटते हैं ,पवित्र सरोवर की परिक्रमा करतें हैं (जिस सरोवर में मैंने कभी पानी नहीं देखा )और उद्देश्य केवल और केवल भूत -प्रेत से मुक्ति











राउर बाबा कौन थे ,इनकी ऐतिहासिकता क्या है ,मैं अभी तक पता नहीं कर पाया .कारण संभवतः यही है कि इसका कोई संकेतक साक्ष्य मुझे अभी तक प्राप्त नहीं है लेकिन यहाँ पर जुटने वाली भारी भीड़ बहुत कुछ कह जाती है .इस पूरे मेला परिसर में चाय -पान की दुकानों से ज्यादा ओझाओं और तांत्रिकों की दुकानें सजती हैं .भूत -प्रेत से मुक्ति पानें की आशा में आये हुए लोंगों से बात -चीत करनें पर पता चला कि यहाँ आने मात्र से भूत -पिशाच जल कर नष्ट हो जाते हैं










राउर बाबा के समाधि के ऊपर पार्वती -सरस्वती की प्रतिमा है .बाबा की समाधि के पीछे उनकी पत्नी सती भुनगा की समाधि है .वही पर सटी हुई हनुमान जी की भी मूर्ति है .परिसर में श्री राम चन्द्र जी -लक्ष्मन-सीता जी की भी मूर्तियाँ हैं .जनश्रुति के अनुसार प्रभु श्री राम चन्द्र जी द्वारा सभी तीर्थों से लाये गए जल को इस सरोवर में डाला गया है इस लिए गंगा दशहरा के दिन इस पवित्र सरोवर का जल अमृत मय होता है .इस स्थान को "राम गया " भी कहा जाता है .कहा जाता है कि १५० वर्ष पूर्व मीरजापुर के
हर सुख दास मोहता का पूरा परिवार प्लेग की बीमारी के चलते नष्ट हो गया था तब राउर बाबा की कृपा से ही उनका वंश आगे चल पाया ,अपनी मृत्यु के पूर्व हर सुख दास मोहता नें अपने परिवारी जनों को यह निर्देश दिया था कि प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को मेरे समस्त वंशज गंगा दशहरा के दिन बाबा के दरबार में आयेंगे .मैंने भी देखा कि उस परिवार के सभी सदस्य इस मेले में आये थे .खास बात यह है कि अब यह परिवार काफी बढ़ चुका है और देश के कई प्रान्तों में निवास कर रहा है लेकिन आस्था ऐसी कि सब के सब बाबा की समाधि की पूजा में लीन थे .इस मेले में आने वाले लोग स्थानीय कम होतें हैं लेकिन कोलकाता,मुंबई ,कटक ,भुवनेश्वर ,रायपुर और विजय नगर आदि स्थानों से काफी लोग इस मेले में आते हैं . एक सप्ताह तक चलनें वाले इस मेले में हर जगह केवल ओझाई और भूत -प्रेत के निवारण का ही चक्कर दिखाई पड़ता है .गंगा दशहरा कें दिन मेला अपनें चरम पर होता है फिर दो -तीन बाद तक समाप्त हो जाता है .और सबसे खास बात यह कि यह एक मामले में अनोखा है कि यहाँ पुरोहित का कार्य ब्राह्मण नहीं करते ,यहाँ पर पुरोहित परम्परागत रूप से एक परिवार का होता है जो कि पिछडी जाति (बिन्द )है .यहाँ भूतों को उतरने की क्रिया देख कर मैं दंग हूँ .इस परिसर में कैमरा लेकर घूमना खतरे से खाली नहीं है .मेरे साथ एक सम्मानित हिन्दी दैनिक के पत्रकार ओंकार जी हैं उन्होंने सारी तस्वीरों को चुपके -चुपके लिया .कोई देख लेता तो मुसीबत थी ,तब भी हम लोग बेहतरीन दृश्यों को अपने कैमरे में कैद नहीं कर पाए .यह हमारे इक्कीसवीं सदी के भारत की तस्वीर है ऐसे में हम भाई जाकिर जी को क्या बताएं .अभी ज्ञान का सूरज लगता है लम्बा समय लेगा उदय होनें में ....

26 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. मैंने बचपन से ही इस मेले के बारे में जाना सुना है -ठीक स्मृति नहीं है ,शायद बचपन में गया भी हूँ एकाध बार ! वैसे तो नात- रिश्तेदारी करने इस रास्ते से कई बार गुजरा हूँ ! मेले में बच्चों के बड़े इन्नोवेटिव खिलौने मिलते हैं ! एक खिलौना मुझे इसी मेले से स्वर्गीय बाबा जी लाये थे -रंग बिरंगा नेवला जो घिरनी पर आगे पीछे भागता था !
    मुझे याद है इस सरोवर में पहले पानी था -और यही सरोवर है जिससे मुझे राम चरित मानस शब्द के अर्थ को बुद्धि गम्य करने में सुविधा हुयी थी ! यह भव्य सरोवर मुझे मानसरोवर सा लगता था और इसकी सुन्दर निर्मित सीढियां मानस के काण्ड ! जगह भी विस्मय , कौतूहल ,भय आदि के कुछ आदि मूल भावों को उद्दीपित करने में भी कारगर है -मगर सरोवर की वर्तमान दुर्दशा देख कर दुःख हुआ ! किसी भी को इसकी चिंता नहीं कि उसका जीर्णोद्धार कर उसे आधुनिक और भव्य रूप दिया जाय -न तो सामाजिक चेतना दिखती है और न ही सरकारी प्रतिबद्धता ! बस भूत प्रेतों के नाम पर हर वर्ष यहाँ केवल नौटंकी हो रही है ! बहुत लोगों के लिए व्यावसायिक उल्लू सीधा करने का एक मौका भर हो गया है यह आयोजन !
    रिपोर्ट सचित्र है और अच्छी बन पडी है पर भूत प्रेतों से ग्रस्त कुछ लोग लुगायियों और उनके परिजनों का साक्षात्कार भी मिल सके तो वह भी स्वागत योग्य रहेगा ताकि ऐसी कुछ केस हिस्ट्रीज कलेक्ट हो सकें !

    मेरे एक ब्लॉगर मित्र की अपेक्षा है कि उन महिलाओं के बारे में लिखा जाय जो कई तरीकों से मति विभ्रम( हैलूसिनेशन ) की शिकार हैं और लोग समझते हैं कि वे भूत प्रेत से ग्रस्त हैं ! जून में होने वाला यह मई का मेला इस लिहाज से कई महत्वपूर्ण अध्ययन के दस्तावेजों को जुटा सकता है !

    उत्तर देंहटाएं
  3. लोगों की आस्था के बारे में क्या कहें ! गांवों में कई स्थान मिल जायेंगे जहाँ भुत प्रेत उतारने का दावा किया जाता है और वहां लोग आते भी है | बचपन में गांव में कई औरतों में भुत-प्रेत आने का नाटक देखा करते थे पर अब एक भी मामला देखने को नहीं मिलता ! शायद भुत नहीं रहे ! या आजकल महिलाओं को पहले की अपेक्षा मिले खुलेपन के चलते इस समस्या का समस्या का समाधान हो गया !

    उत्तर देंहटाएं
  4. मनोज भाई
    आपकी लेखनी मे जो प्रवाह है उसका मे कायल हूँ जैसे लगता है के नदी कल कल करती हुई आगे बढ़ रही है शब्द और भावः एक दुसरे को पछाड़ने की होड़ करते दीखते हैं काश इस हुनर से मे पहले रूबरू हो पता एक बार पुन बधाई रोचक लेख के लिए

    उत्तर देंहटाएं
  5. मेले का बहुत ही सुन्दर वर्णन. इस प्रकार के मेले हमने आदिवासी बहुल क्षेत्रों में देखा है/सुना है. जौनपुर जैसे अपेक्षाकृत जागरूकता वाले जगहों में ऐसे आयोजन अचंभित करते हैं. उस सरोवर की सीढियां ही बता रही है की कभी उस सरोवर में भरपूर पानी रहा होगा. अब सूखा पड़ा है. भू जल की स्थिति बड़ी डरावनी लग रही है. हम जिस इलाके में रह रहे हैं, यहाँ अब तक जल संकट का सामना नहीं हुआ था. कैम्पस में दो बोर हैं. कल से पानी नहीं मिल रहा है. त्राहि त्राहि मची है.

    उत्तर देंहटाएं
  6. ज्ञान का सूरज तो उग चुका है। अज्ञान भी नष्ट जरूर होगा। पर मौजूदा व्यवस्था ही इस अज्ञान की पोषक भी है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. bahut ही अजीबो गरीब है यह मेला--

    कुछ ऐसे ही दृश्य ,सुनते हैं पूना के आस पास कहीं एक गाँव में भी देखे जा सकतेहैं.
    कई बार टी वी पर इन कार्यक्रमों को दिखाया जाता है--यह मेला भी उसी श्रेणी का लगता है--
    वास्तव में हमारे देश में सरकारी तंत्र और व्यवस्था को कडा होना पड़ेगा अन्यथा कुछ नहीं होने वाला---
    वैसे बडे बडे लोग भी इन चक्करों में पड़ जाते हैं तो एक गरीब इंसान की क्या कहें?और डेमोक्रेसी भी है जिस से ऐसी चीज़ों को रोकने वाले जो लोगों की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ बताया जायेगा..
    जन जागृति लाने से ही कुछ होगा. इस देश में अगर बाल विवाह और सटी प्रथा जैसी कुरीतियों को रोकने के लिए कानून है तो ऐसी practise करने वालों के लिए भी कानून होना चाहिये जो भोले भाले लोगों को अस्पताल में इलाज करवाने की जगह झाड़ फूंक करवाते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  8. कितनी ही विविध बातों से bhara है अपना देश............... सुन्दर chhitron से भरी dilchasp पोस्ट है

    उत्तर देंहटाएं
  9. अच्छी रोचक जानकारी दी है।वैसे यह सब अपनी अपनी आस्था पर निर्भर करता है कि आप इसे किस नजरिए से देखते हैं। अब कुछ को एलोपैथी पर, कुछ को आयुर्वेद पर तो कुछ को होमे पैथी पर विश्वास अधिक होता है सो कुछ को इन पर भी हो तो कोई आश्चर्य नही।जहाँ लाभ मिले इंसान वही जाता है।.....वैसे भी गरीब आदमी क्या करे, चिकित्सा उस की पहुँच से बाहर की बात होती जा रही है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. रोचक रिपोर्ट. चित्र और जानकारी अच्छी लगी. परमजीत बाली जी से सहमत हूँ कि "गरीब आदमी क्या करे, चिकित्सा उस की पहुँच से बाहर की बात होती जा रही है"

    उत्तर देंहटाएं
  11. मनोज जी, मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि ऐसे मेले हर शहर में लगते हैं। लखनउ में ही रायबरेली रोड पर शिवगढ रिसोर्ट के पास एक गांव है मदारीखेडा, वहॉं भी ऐसे भूत उतरवाने वाले इकटठा होते हैं। मै बचपन में कई बार वहाँ गया हूं और पाया है कि वहॉं पर आने वाले 100 प्रतिशत लोग अति निम्‍न वर्ग के होते हैं और 99 प्रतिशत महिलाऍं। क्‍या आपने सोचा है कि ऐसा क्‍यों?

    उत्तर देंहटाएं
  12. @भाई साहेब इसका खुलासा आप ही करें ?

    उत्तर देंहटाएं
  13. आप हर बार अनूठे अनुभवों को सुन्दर शब्द देते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  14. आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
    बहुत बढ़िया लगा! आपने बड़े ही खूबसूरती से मेले के बारे में लिखा और मुझे काफी जानकारी मिली!

    उत्तर देंहटाएं
  15. आज आपकी पोस्ट काफी देर से पढ़ रहा हूँ . २१ वी सदी में ये सब होना अचंभित कर देने वाला है . बहुत बढ़िया जानकारी दी है अपने . आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  16. मनोज जी ! बेहद सार्थक पोस्ट...दुर्भाग्य से हमारा समाज अभी भी अन्धविश्वासी है. यही कारण है कि बाबा और तांत्रिक लोग प्रश्रय पाते हैं. मीडिया में छाये जडेजा के केस को ही देख लें....अभी भी समाज को जागरूक होने में काफी वक़्त लगेगा.

    उत्तर देंहटाएं
  17. sahai me jaunpur me bahut kuch hai jise hum itne din me nahi jan paye the aap ne batya thax

    उत्तर देंहटाएं
  18. jaunpur ka parichay jis andaz mein aap kara rahein hain wah sach mein kaabile taarif hain...

    उत्तर देंहटाएं
  19. राउर बाबा का मेला शायद जौनपुर ही नही पूरे उत्तर प्रदेश में प्रसिद्ध है । यहाँ आस्था का महिमा मंडन किया जाता है । सभी कोई भूत प्रेत की बातें करता है । स्थानीय प्रशासन भी इनका साथ देता है लेकिन कोई ये नही सोचता की हमारी आने वाली पीढी पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा । आपने इसके बारे में जो जानकारी दी है शायद वो काफ़ी है लोगों को जागरूक करने के लिए,लकिन ये बातें सिर्फ़ ब्लॉग तक ही सीमित नही होनी चाहिए । हमें ऐसा कुछ करना होगा की लोग इसके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा तादात में जागरूक हों सके ।

    उत्तर देंहटाएं
  20. आपकी पुरानी पोस्टें खंगाल रहा था तो ये पोस्ट हाथ आई। बहुत अच्रोछी जानकारी है । न जाने कब स्थिति सुधरेगी। वैसे, ये माहौल लगभग हर प्रात में कहीं न कहीं दिख ही जाती है।
    अच्छी पोस्ट।

    उत्तर देंहटाएं
  21. टिप्पणी में अचोछी की बजाय अच्छी जानकारी पढें।

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियाँ मेरे ब्लॉग जीवन लिए प्राण वायु से कमतर नहीं ,आपका अग्रिम आभार एवं स्वागत !