बुधवार, 29 जुलाई 2009

आत्मा घर बदल रही होगी.

दीप की लौ मचल रही होगी
रूह करवट बदल रही होगी |
रात होगी तुम्हारी आंखों में
नींद बाहर टहल रही होगी ||

चैन सन्यास ले लिए होगा
पीर टाले न टल रही होगी |
तुम चिता देख कर न घबराओ
आत्मा घर बदल रही होगी||

जगमगाती है उनकी आँखे तो
रोशनी दिल में पल रही होगी |
यह जो खुशबू है ,फूल के तन से
जान उसकी निकल रही होगी ||

एक आवारा गूँज तो इनके
उनके सीने में ढल रही होगी
जिसको दो गज जमीन भी न मिली
वह जफर की गजल रही होगी ||

(जौनपुर के महाकवि स्व .पंडित रूप नारायण
त्रिपाठी जी की बहुप्रशंसित रचना )

64 टिप्‍पणियां:

  1. रात होगी तुम्हारी आंखों में
    नींद बाहर टहल रही होगी ||

    क्या बात है डा० साहब। इन पंक्तियों ने मुझे बहुत आकर्षित किया। सुन्दर अभिव्यक्ति।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  2. शायद महारानी गायत्री देवी जी की आत्मा भी महल बफल रही होगी क्यूँ ? क्या पता ? कविता पसंद आयी -
    - लावण्या

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  3. स्व .पंडित रूप नारायण त्रिपाठी जी की
    बहुश्रुत रचना को पुनः उधृत करने के लिए धन्यवाद !

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  4. बहुत अच्छी रचना त्रिपाठी जी की..

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  5. आत्मा घर बदल रही होगी...!!
    बहुत खूब..!!

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  6. जगमगाती है उनकी आँखे तो
    रोशनी दिल में पल रही होगी |
    यह जो खुशबू है ,फूल के तन से
    जान उसकी निकल रही होगी ||

    बहुत अच्छी रचना धन्यवाद...

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  7. बहुत सुंदर रचना। पढ़वाने के लिए आभार!

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  8. एक एक पंक्ति जैसे गहन घन हहर हहर जांय
    "जिसको दो गज जमीन भी न मिली
    वह जफर की गजल रही होगी"


    बहुत खूब!

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  9. महत्वपूर्ण रचना की प्रस्तुति के लिए आभार ।

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  10. चैन सन्यास ले लिए होगा
    पीर टाले न टल रही होगी |
    तुम चिता देख कर न घबराओ
    आत्मा घर बदल रही होगी||

    bahut bhavpurn..sundar kavita..
    badhayi manoj ji..

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  11. चैन सन्यास ले लिए होगा
    पीर टाले न टल रही होगी |
    तुम चिता देख कर न घबराओ
    आत्मा घर बदल रही होगी||

    गहरे भावों के साथ बहुत ही सुन्‍दर पंक्तियां,
    आपको इस प्रस्‍तुति के लिये आभार्

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  12. एक आवारा गूँज तो इनके
    उनके सीने में ढल रही होगी
    जिसको दो गज जमीन भी न मिली
    वह जफर की गजल रही होगी ||
    lलाजवाब बहुत बहुत बधाई

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  13. चैन सन्यास ले लिए होगा
    पीर टाले न टल रही होगी |
    तुम चिता देख कर न घबराओ
    आत्मा घर बदल रही होगी||
    बहुत बहुत खूब !!!

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  14. बहुत लाजवाब रचना. आभार आपका.

    रामराम.

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  15. तुम चिता देख कर न घबराओ
    आत्मा घर बदल रही होगी||..
    यह गहन दर्शन पढ़ कर तो रोम सिहर उठते हैं ,बेहतरीन रचना ,बधाई.

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  16. तुम चिता देख कर न घबराओ
    आत्मा घर बदल रही होगी||..
    यह गहन दर्शन पढ़ कर तो रोम सिहर उठते हैं ,बेहतरीन रचना ,बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  17. पंडित जी की यह रचना उन लोगों को अवश्य पढ़ना चाहिए जो मृत्यु से डरते है । यह रचना पढ़कर मेरा रोम -रोम सिहर उठा । वकई सुंदर रचनाकारों से भरा है हमारा देश बस उन्हें आप जैसा कदरदान मिलना चाहिए।
    क्या पंक्ति है .......दीप की लौ मचल रही होगी,रूह करवट बदल रही होगी | रात होगी तुम्हारी आंखों में,नींद बाहर टहल रही होगी ||

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  18. तीन-चार बार आ कर लौट गया हूँ ,समझ नहीं पा रहा कि किन पंक्तियों का चयन कर उसे श्रेष्ठ कह प्रशंसा करूँ एक वर्ग चुनता हूँ तो शायद दूसरी पंक्ति वर्ग की भावनाएं आहत होंगी |अतः स्व० त्रिपाठी जी को नमन कहना ही मेरी नज़र से शायद सही टिपण्णी होगी !!! ?
    और इस प्रस्तुति के लिए आप का आभारी हूँ धन्यवाद

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  19. kya bat kahi hai aapane ........kawita to masaalaah ........her ek pankatiy par jaan nikal rahi hai .......kyoki baat ruh tak pahuch rahi hai....badhaaee

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  20. रात होगी तुम्हारी आंखों में
    नींद बाहर टहल रही होगी ||

    waah ...
    poori rachana hi sambhaal kar rakh li hai maine..yah kavita to mujhe bahut hi pasand aayi hai.
    bahut hi khoobsurat kavita aap ne padhwaayee.bahut achchhee pasand hai aap ki.

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  21. चैन सन्यास ले लिए होगा
    पीर टाले न टल रही होगी |
    तुम चिता देख कर न घबराओ
    आत्मा घर बदल रही होगी||

    bahut hi sundar bhav!

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  22. चैन सन्यास ले लिए होगा
    पीर टाले न टल रही होगी |
    तुम चिता देख कर न घबराओ
    आत्मा घर बदल रही होगी||

    लाजवाब रचना!!!!स्व .पंडित रूप नारायण त्रिपाठी जी की इस बेहतरीन रचना को प्रस्तुत करने के लिए आभार्!!

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  23. इतनी सुन्दर रचना के लिये आभार...पढकर बहुत अच्छा लगा.

    गुलमोहर का फूल

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  24. सुन्दर! आभार इसे पढ़वाने के लिये।

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  25. बहुत ही सुन्दर अच्छी रचना . बधाई.

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  26. jivan aur mritu ek dusare ke purak hai .hum sab is se badhe hai . tabhi to hame aage badah ne ka awsar milata hai. bahut sundar w sajiw kavita ko lane ke liye hum aabhari hai

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  27. सुन्दर। यह तो आत्मा की नश्वरता और पुनजन्म में आस्था जगाती है कविता। हिन्दू धर्म के यही तो आधार हैं।

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  28. एक अच्छी रचना प्रस्तुत करने के लिये बधाई

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  29. सर्व प्रथम तो आपका हार्दिक आभार जो आपने जौनपुर के महाकवि स्व .पंडित रूप नारायण त्रिपाठी जी की बहुप्रशंसित रचना से हम सब को अवगत कराया.
    रचना निश्चय ही प्रशंशनीय है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है.
    किन्तु एक जिज्ञासा है कि निम्न पंक्तियों किस सन्दर्भ में लिखी गईं हैं......

    "उसको दो गज जमीन भी न मिली
    वह जफर की गजल रही होगी ||'

    स्पष्टीकरण की प्रतीक्षा में.....

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  30. @यह पंक्तियां किस सन्दर्भ में लिखी गईं ,यह स्पष्टीकरन तो स्वर्गीय त्रिपाठी जी ही दे सकते थे .

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  31. बहुत ख़ूबसूरत और लाजवाब रचना लिखा है आपने! इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई!

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  32. कबीर ने कहा है- घूँघट के पट खोल तोहे पिय मिलेंगे,

    चलो भाई जब तक पिय नहीं मिले तब तक इसी तरह घर बदलते रहेंगे हम-सब

    http://som-ras.blogspot.com

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  33. आपकी रचनाओं पे comment करने में हमेशा झिझक होती है ..और मेरे पहले ही जब इतना कुछ कह जाते हैं, तो और क्या कहूँ?

    http://shamasansmaran.blogspot.com

    http://shama-kahanee.blogspot.com

    http://shama-baagwaanee.blogspot.com

    http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com

    http://fiberart-thelightbyalonelypath.blogspot.com

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  34. एक बार फिर बेहतरीन प्रस्तुति... वाहवा..

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  35. बहादुर शाह जफ़र अपने अंतिम वक्त में अपने वतन से दूर रंगून में थे मादरे वतन से अलगाव उनकी अंतिम ग़ज़लों में साफ़ दिखता है
    "इतना है बदनसीब जफ़र दफ़न के लिए
    दो गज जमीन भी न मिली कू(वतन या प्रेमिका ) ए यार में "

    उनकी ये ग़ज़ल उनकी इसी भावना को दर्शाती है पंडित त्रिपाठी जी ने ये पंकितियाँ
    "उसको दो गज जमीन भी न मिली
    वह जफर की गजल रही होगी ||'
    बहादुर शाह जफ़र की ग़ज़ल के परिप्रेक्ष्य में लिखी थी

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  36. दीप की लौ मचल रही होगी
    रूह करवट बदल रही होगी |
    रात होगी तुम्हारी आंखों में
    नींद बाहर टहल रही होगी , अदभुत ,आत्मा में धंस गयी यह पंक्तियां ..................

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  37. तुम चिता देख कर न घबराओ
    आत्मा घर बदल रही होगी||

    अति सुन्दर. कभी रूपनारायण जी के बारे में भी पूरी जानकारी दीजिए. हिन्दी जगत के तमाम नए पाठक उनसे लगभग अपरिचित ही हैं.

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  38. दीप की लौ मचल रही होगी
    रूह करवट बदल रही होगी |
    रात होगी तुम्हारी आंखों में
    नींद बाहर टहल रही होगी ...स्व पंडित रूपनारायण त्रिपाठी जी को नमन ..आपने उनको हमसे परिचित कराया ...श्रंगार रस की अच्छी पंक्तियाँ

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  39. चैन सन्यास ले लिए होगा
    पीर टाले न टल रही होगी |
    तुम चिता देख कर न घबराओ
    आत्मा घर बदल रही होगी||
    Wah aaj ek nai baat mili
    aabhaar

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  40. इष्ट मित्रों एवम कुटुंब जनों सहित आपको दशहरे की घणी रामराम.

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  41. अंतराल लंबा हो गया है | नयी पोस्ट की प्रतीक्षा है |

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  42. Namste Manoj ji,

    [mahino se aap ne blog update nahin kiya hai.
    ??]
    -aap ko aur aap ke parivar mein sabhi ko Diwali ki shubhkamnayen .
    -abhaar sahit,
    Alpana

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  43. इष्ट मित्रों एवम कुटुंब जनों सहित आपको दिवाली की घणी रामराम.

    रामराम.

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  44. रात होगी तुम्हारी आंखों में
    नींद बाहर टहल रही होगी ||

    स्व पंडित रूपनारायण त्रिपाठी जी को नमन ..बधाई.

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  45. चैन सन्यास ले लिए होगा
    पीर टाले न टल रही होगी |
    तुम चिता देख कर न घबराओ
    आत्मा घर बदल रही होगी||
    .....vah, bahut khubsurat,

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  46. आपका वापिस आना ज्यादा सुखद है या ये पंक्तियाँ पढ़ना...बताना मुश्किल है ...

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  47. Bade dino baad aapke blog pe aayee hun..aur padhi huee rachnaka dobara aanand uthaya..ek kasak phirse mahsoos huee...ek peer tahalte hue dil me sama gayi..

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  48. डा.मनोज भैया ,
    इतना लम्बा अंतराल ? हम क्या पुनि पुनि अब तक के लिखे का ही आनंद लिए जाएँ ?

    नव वर्ष की शुभ कामनाएं !

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  49. मनोज जी आप को और परिवार में सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ.

    Abhaar

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  50. सिर्फ बधाई से काम नहीं चलेगा, पोस्ट भी लिखनी होगी।

    नव वर्ष की अशेष कामनाएँ।
    आपके सभी बिगड़े काम बन जाएँ।
    आपके घर में हो इतना रूपया-पैसा,
    रखने की जगह कम पड़े और हमारे घर आएँ।
    --------
    2009 के ब्लागर्स सम्मान हेतु ऑनलाइन नामांकन
    साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन के पुरस्कार घोषित।

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  51. नववर्ष की आप सभी को हार्दिक शुभकामना - महेन्द्र मिश्र

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  52. नववर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ!

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  53. अक्‍सर आपके ब्‍लाग पर आने पर पाया कि आप अनुपस्थित हैं, आज नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ आप मेरे ब्‍लाग पर अपने आशीष के साथ आये, बहुत ही अच्‍छा लगा, आप नववर्ष में कुछ नया रचें इन शुभकामनाओं के साथ नववर्ष की ढेर सारी बधाई ।

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  54. एक एक पंक्ति जैसे गहन घन हहर हहर जांय
    "जिसको दो गज जमीन भी न मिली
    वह जफर की गजल रही होगी"

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  55. ओह छह माह छुट्टी मारे थे। वाह! इसको भी अपनी आवाज दीजिये!

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आपकी टिप्पणियाँ मेरे ब्लॉग जीवन लिए प्राण वायु से कमतर नहीं ,आपका अग्रिम आभार एवं स्वागत !