बुधवार, 29 अक्तूबर 2008

कैसी रही साहित्यकारों की दिवाली !

http://manjulmanoj.blogspot.com/

आज ही अभी मेरी एक बुजुर्ग लेकिन सक्रिय साहित्यकार से दिवाली की शुभ कामना को लेकर वार्ता हुई .उन्होंने कहा कि मै कोई ब्यवसायी तो हू नही कि यह गुणा भाग कर सकू कि मेरी दिवाली पर क्या आय हुई .हाँ इतना जरुर है की एक त्यौहार के रूप में आनंद लिया गया.उन्होंने लगे हाथ अपनी पीड़ा भी बता दी की हम साहित्यकारों को कौन पूछ ही रहा है .उन्होंने मुझे बनारस के महाकवि स्वर्गीय चच्चा की कविता का भी स्मरण दिलाया जो कि आप सब के अवलोकनार्थ लिख दे रहा हूँ -
वैद्य
,हकीम , मुनीम ,महाजन ,साधु ,पुरोहित, पंडित पोंन्गा
लेखक लाख मरे बिनु अन्न चचा कविता करि का सुख भोगा .
पाप को पुण्य भलो की बुरो ,सुरलोक की रौरव कौन जमोगा
देश बरे कि बुताये पिया हरसाए हिया तुम होहु दरोगा !!
यह रचना आजादी के पहले की है .इतने सालो बाद भी हालात वहीं है.कैसी दिवाली और किसकी दिवाली .
आपकी प्रतिक्रिया के इन्तजार में सादर,

8 टिप्‍पणियां:

  1. देश बरे कि बुताये पिया हरसाए हिया तुम होहु दरोगा !!
    बिल्कुल सही कहा आपने ! आज भी वही हालत हैं ! कविता
    पढ़वाने के लिए बहुत आभार आपका ! शुभकामनाएं !

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  2. लाज़बाब आपका ब्लॉग जगत में स्वागत है . निरंतरता की चाहत है . मेरे ब्लॉग पर पधारें मेरा आमंत्रण स्वीकारें

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  3. स्वागत है चिट्ठाजगत में। यूं ही लिखते रहें,

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  4. बहुत बहुत स्वागत है आपका. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाऐं.

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  5. ब्लॉग परिवार में स्वागत . शुभकामनाएं और स्वागत मेरे ब्लॉग पर भी.

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  6. इसई का जिक्र फ़िर ज्ञानजी के ब्लॉग पर भी हुआ।

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