बुधवार, 29 अक्तूबर 2008

आज अखबार नहीं आया है !

आज अखबार नही आए हैं बड़ा अनकुस लग रहा है .दरअसल अखबार हमारी दिनचर्या के अभिन्न अंग बन गए हैं .बिना उनके दिन कितना सूना सूना सा हो जाता है .दीवाली ही एकमात्र ऐसा त्यौहार है जिसमें अखबार के कार्यालय भी खुले रहते है क्योंकि यह एक वाणिज्यिक कारोबार है और लक्ष्मी पूजक भला इस व्यवसाय को दिवाली की रात क्यों नहीं जगाना चाहेंगे -फलतः एक दिन बाद समाचार पत्रों के कार्यालय बंद रहते हैं -यानी कल अखबार छपे नहीं और आज बटे नहीं लिहाजा आज के सुबह की शुरुआत बड़ी बेमजा सी है .इन्टरनेट पर भी देशी समाचारों का टोटा है ।
हमलोग समाचारों के आदी हो चुके हैं -हर क्षण किसी न किसी स्कूप की बाट जोहते रहते हैं . वे लोग काफी राहत से हैं जिन्हें यह लत नहीं है -सबसे भले वे मूढ़ जिन्हें न व्यापहि जगत गति .आज वे मजे से हैं -उनके जीवन में आज कुछ भी अनचाहा सा नही है .उनकी दिनचर्या कोई नयी उदासी नही झेल रही है .शायद यह ब्लॉग जगत आज कुछ मुझे अखबार न होने की तसल्ली सा दे रहा है .यह कुछ समाचार पढने की प्रात- उद्विग्नता का शमन कर रहा है ,पर शायद यह एक नई लत लग रही है ,मगर यह भी ना उदास करने लगे इस संभावना से आशंकित भी हूँ -क्या हमें प्रौद्योगिकी पर इतना निर्भर होना चाहिए ?

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपने बड़ा सटीक और सामयीक लिखा है ! यकीन रखिये आपका नया शौक बहुत तेज नशे वाला है ! अखबार का नशा चाय जैसा है और ब्लागिंग का नशा अफीम जैसा ! थोडा समय बीतने दीजिये आप अखबार भूल जायेंगे ! :)

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  2. ताऊ जी की बात सही है, सच कहूँ तो नशे की ये लत लगवाने में ताऊ का भी बड़ा हाथ है। अब हम भी लोगों को एक-एक घुट्टी तो दे ही दि‍या करते हैं:)

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  3. कोई भी आदत कभी उदासी का सबब तो बन ही सकती है पर उस आशंका की वजह से आज न खुश हो, यह कैसे हो पायेगा.

    सबसे भले वे मूढ़ जिन्हें न व्यापहि जगत गति -सही है. :)

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  4. "आज अखबार नही आए हैं बड़ा अनकुस लग रहा है" मुझे भी बहुत जोरों की तलब लगी, मन को बहुत समझाया। विषय चयन काबिल-ए-तारीफ है। नये ब्लॉग के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।

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  5. सही है जी। रोज पोस्ट ठेलने लगें तो अखबार भूल जायेंगे। पर पोस्टें अखबार मूलक न हों तो। :-)

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आपकी टिप्पणियाँ मेरे ब्लॉग जीवन लिए प्राण वायु से कमतर नहीं ,आपका अग्रिम आभार एवं स्वागत !