शनिवार, 25 अप्रैल 2009

फ़िर तो बंद हो जायेंगी रेजर कम्पनियाँ !

आज हमारे क्षेत्र में सुबह- सबेरे एक स्थान पर, श्री राम चरित मानस का पाठ चल रहा था .सामाजिक सरोकारएवं सहभागिता निभाने मैं भी वहाँ पहुँचा .मेरे अंदर की खोज बीन वाली भावना लगातार सक्रिय रहती है ,उसी के दरम्यान मैंने देखा कि दूर एक चारपाई के पास कई लोग कुछ देख-सीख रहें हैं .उत्सुकता वश मैंनें भी अपनी दृष्टी को वहाँ केंद्रित किया तो मुझे एक अनोखा दृश्य दिखाई दिया वह यह कि एक बुजुर्ग सज्जन अपनी शेविंग नंगी ब्लेड से कर रहें है .मुझे आश्चर्य हुआ क्योंकि आज इस तरह का दृश्य नतो मैंने देखा था और नही करने की कभी सोच ही सकता हूँ .यह एक जोखिम भरा कार्य है .और तो और ,उनसे इस विधा को सीखने वालों की लाइन भी लगी थी और वे सबसे बेपरवाह अपने नित्य, दैनिक कर्म में लगे थे .मैंने तुरंत अपने कैमरे (जो कि सदैव मेरे साथ रहता है ) से उनकी तस्वीर उतारी ताकि आप भी इस नवीनता को देख सकें क्योंकि मेरे लिए तो यह अनोखा था .

ये सज्जन हैं श्री कमला प्रसाद जी जो कि बांगर खुर्द गाँव जिला सुल्तानपुर के निवासी एक अवकाश प्राप्त प्राइमरी पाठशाला के शिक्षक हैं , अपने रिश्तेदारी के चलते निमंत्रण में जौनपुर आये हैं . मैंने उनसे कहा कि यह तो शेविंग करने का वैज्ञानिक तरीका नहीं है ,इस तरह तो कभी आप मुसीबत में पड़ जायेंगे .उन्होंने कहा कि मैं तो बिलकुल आराम से पिछले तीन दशकों से इसी तरह शेविंग कर रहा हूँ मुझे तो आज तक कभी कोई परेशानी नहीं हुई और बहुतों को मैंने इसी तरह शेविंग करना सिखाया है .मेरे लाख समझाने के बाद भी वे अपने विचारों पर अटल रहे ,और अपने तर्कों को सक्रिय करते रहे तथा लोगों को इस तरह शेविंग से होने वाले फायदे के बारे में बताते रहे .
चाहे भी हो यह मेरे लिए तो बहुत ही हैरत अंगेज रहा मैनें आज तक इस तरह से किसी को शेविंग करते नहीं देखा था . दिन में कई बार सोचा कि कि कैसे -कैसे जुगाड़ लोग ढूंढ लेते हैं, इस तरह अगर सभी अपनी शेविंग करनें लगे तो फ़िर तो बंद हो जायेंगी रेजर कम्पनियाँ !

23 टिप्‍पणियां:

  1. इससे मिलता जुलता तरीका अमेजन घाटी में बसे आदिवासियों में प्रचलित है फर्क यही है कि वो घास ( सरपतनुमा तीखी पत्ती) का इस्तेमाल शेविंग के लिये करते हैं और यहाँ ब्लेड का इस्तेमाल हो रहा है।

    रोचक जानकारी।

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  2. मिश्राजी, आप शायद यकीन ना करें..पर ये कोई अजूबा नही है..कम से कम मेरे लिये तो. हालांकि मैं रेजर का ही उपयोग करता हूं पर अगर ना मिले तो नंगी ब्लेड से आराम से दाढी बना लेता हूं. ना मैने किसी से सीखा और ना ही कुछ और..पर सच बोल रहा हूं...मजाक नही कर रहा हूं...

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  3. ऐसे एक सज्जन को तो मैं भी जानता हूँ. बचपन से उनको देखा है ऐसे ही दाढ़ी बनाते हुए.

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  4. @ताऊ जी आपके दावे पर यकीन नहीं हो रहा ,कृपया नंगी ब्लेड से शेविंग करते अपना चित्र भेंजे तभी यकीन होगा .

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  5. अरे इसमें आश्चर्य न करें। हमने बहुतेरे लोगों को ब्लेड से दाड़ी बनाते देखा है।

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  6. मिश्राजी, ताज्जुब नही करें और एक बात कि बिना कांच के ही बन जायेगी. यकीन किजिये..कभी आपको चित्र तो क्या पुरा विडियो ही भेज देंगे.

    रामराम.

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  7. मनोज जी विश्वास तो करना ही होगा,मैं भी ऐसे दो तीन सज्जनों को जानता हूं ,जो इसी तरह शव करते थे,अब जब भी गांव जाऊंगा तो फोटो लेने की कोशिश रहेगी श्याम सखा श्याम
    thanks 4 following my blogs

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  8. मैंने भी देखा है बहुतों को मुझे कोई आश्चर्य नही हुआ.

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  9. भारत अनेक अजूबों का देश है! कमला प्रसाद एक हैं!

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  10. sahab ye ajooba nahi...kabhi-kabhi shahri log bhi aisa karte hain. ham bhi kabhi-kabhi aise hi banaate hain.....banaa kar dekhiye fir pataa chalega ki ye ajooba hai ya fir............

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  11. किसी के सिर में जब चोट लगती है और डॉक्टर को टांके लगाने होते हैं, तो वहाँ भी कोई नर्स नंगे ब्लेड से ही चोट की चमड़ी पर से बाल साफ कर डालती है। जब पहली बार मैंने वह दृश्य देखा था तो मेरे मुख से भी वही निकला था "अजूबा!!!"

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  12. हमने तो कभी नहीं देखा. मुझे तो डरावना लग रहा है !

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  13. कभी कभी विवशता आविष्कार की जननी बन जाती है

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  14. हे भगवान...फोटो में बुजुर्ग सज्ज़न तो गला काट लेने की तैयारी में दिखे...

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  15. भाई अनुराग जी ने लिखा कि ...
    "कभी कभी विवशता आविष्कार की जननी बन जाती है"
    यह सच भी हो सकता है, पर सदा सच रहे यह जरूरी नहीं, मेरे विचार से "आखिर ऐसा ही क्यों" जैसी सोंच ही आपको नए-नए प्रयोग पर अमल करवाती है, जो लकीर के फ़कीर बन चुके, उनमें शायद सोंच विकसित हो ही नहीं पाती.

    मेरे पिता जी के फुफेरे भाई जी को भी मैंने आज से कोई तीस साल पहले बिना सेविंग साबुन/क्रीम और बिना रेज़र के दाढ़ी काटते देखा था, जब वह हमारे घर आये थे. उनसे पूछने पर उन्होंने बताया कि वे तो ऐसा पिच्छले छ साल से कर रहे है.

    सेविंग साबुन/ क्रीम के न प्रयोग बारे जानकारी के आभाव में मैंने उस समय तो उनसे कुछ नहीं पूंछा, पर उसी के कुछ दिन बाद बल कटवाते समय जब नाई मेरे ख़त और गर्दन के पास उस्तरा चला रहा था तो मेरे मन में एक विचार कौंधा और मैंने उससे प्रश्न कर ही दिया कि भाई जब तुम दाढ़ी काटते हो तो पहले सेविंग क्रीम लगते हो फिर उस्तरा चलते हो, फिर ख़त, जो दाढ़ी का ही एक हिस्सा है उसे काटने में सेविंग क्रीम न लगा कर सिर्फ पानी फिरा कर ही उस्तरा क्यों चला देते हो.
    उसने उत्तर दिया कि बाबू, फिर हमें दाढ़ी काटने के इतने पैसे कोई क्यों देगा, वैसे एक बात सच कहूं, कोई फर्क नहीं पड़ता. क्या कभी किसी के ख़त के बाल, या गर्दन के ऊपर के बाल कड़े होते देखे हैं.

    इसी बात के बाद से मैंने भी सेविंग क्रीम का उपयोग बंद कर सिर्फ पानी से दाढ़ी को गीला कर रेज़र से दाढ़ी आज तक काटता चला आ रहा हूँ. आज तक न तो मेरी दाढ़ी ज्यादा कड़ी हुई, न ही और कोई परेशानी, साथ ही समय भी ज्यादा बचता है.

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  16. I bet his pet dialogue would be 'Hum to har roj khanjar gardan par rakhten hain' !

    Nice catch

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  17. हे प्रभु!! तेरी माया!!

    भाई साहब, अभी ३ तारीख तो टूर पर हूँ फिर नियमित हो पाऊँगा.

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  18. आश्चर्यजनक और किसी खतरनाक स्टंट जैसा है यह दृश्य।

    ----------
    S.B.A.
    TSALIIM.

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  19. भैय्या हम भी बिना क्रीम साबुन ही अप्नी हज़ामत खुदै कर लेते हैन . यी बात और है कि मुश्किल भाग छोड रखा है .फ़ायद भी है समय भी बचता है .पैसा भी .फ़ैशन बाज़ोन और बौद्धिकोन मे भी मुफ़्त प्रवेश सहज उप्लब्धि . सिख धर्म ज्यद सही है .झन्झत ही नहीन पालते .

    अब समझा अपने ’ताऊ’ जी इत्ना चिक्ना लेखन कैसे कर लेते है .चिक्ना दिखने मे भी कमी नहीन देखी .

    बस उस्तर उलटा ना चले .

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