बुधवार, 13 जनवरी 2010

खिचड़ी : लाई-चूड़ा -कंद-तिलवा और नौपेडवा का पेड़ा.

खिचड़ी (मकर-संक्रांति ) की पूर्व संध्या पर आज अभी शाम को विश्वविद्यालय से घर आते समय रास्ते की बाजारोंमें भारी भीड़ को देख कर मुझे बचपन की याद गयी.आज-कल जैसे बच्चे क्रिसमस के दिन सान्ताक्लाज़ की यादगिफ्ट के लिए करते है ,बचपन में हम लोगखिचड़ी (मकर-संक्रांति ) के ठीक पहली वाली रात को उस लोमड़ी कीयाद करते सो जाते थे,जो कि ऊंट की पीठ पर लाद कर- लाई,चूड़ा , गट्टा,तिलवा और पेड़ा,हम लोंगों के लिए लातीथी और रात में हम सब के दरवाजों पर छोड़ जाती थी,लेकिन अफ़सोस यह कि उसे हम लोग कभी देख पाए।
गांव का जीवन और
गांव के लोग भी कितने अजीब हैं और चाहे जो हो,कितनी भी आर्थिक समस्याएं हों पर त्यौहारके उत्सव में कोई कमी नही . शहरों में तो पता ही नहीं चलता कि कब त्यौहार आये और गये.खिचड़ी के त्यौहार पर मंहगाई की हाल तो पूरा देश जान रहा है लेकिन धूम ऐसी कि हर कोई अपने परिवार के लिए यह सब लेना चाहता है.हम लोंगो के यहाँ एक रिवाज है-पुरातन परम्परा चली आ रही है कि खिचड़ी में हर घर वधू के नैहर से खिचडीआती है.यह है सामाजिक सरोकार का अद्भुत नमूना.ऐसे में कोई भी घर नहीं बचता जहाँ से खिचड़ी आती-जातीहो.दो - तीन दिन से देखता हूँ खिचडी पहुचाने वालों से सड़के पटी पडी हैं,हर किसी को जाने की जल्दी है अपने बहनके घर. खिचड़ी वाले दिन सुबह -सबेरे आग के चारो ओर घेर कर खिचड़ी में आए सुस्वादु व्यंजनों के अद्भुत स्वाद सेसभी दो -चार होते हैं
इस व्यावसायिक युग में,भीषण मंहगाई के बावजूद सामाजिक परम्पराएँ हम सब पर भारी हैं. गावं की बाजार मेंसब कुछ ताज़ा उपलब्ध है.हमारे यहाँ का पेड़ा पूरे जनपद में मशहूर है ,ऐसी खोये की मिठाई जो कि लाई चूड़ा केस्वाद को चार -चाँद लगा देती है .हमारे बाज़ार के हरी काका हैं पेड़ा वाले .चीनी का दाम भले ही आसमान छू लेलेकिन यह मिठाई वह उसी गुणवत्ता के साथ पुराने दामों पर ही बेच रहे है और वाकई आज मैंने भी खाया ,वहीस्वाद -वही दाम पुराना.मैंने कहा काका दाम नही बढ़ाया ,उन्होंने कहा भइया क्या हम जमाखोर हैं .अरे,यह सबकात्यौहार है ,कैसे लोंगो को निराश करें. हमे उतना ही चाहिए जितने में चल जाय, क्या करेंगे दाम बढ़ा कर लेकिन हाँअगर चीनी ५० रूपये के ऊपर गयी तब तो इस दाम में खिला पाएंगे .त्योहारों के प्रति यह समर्पण देख मन बाग़बाग हो उठा.हरी काका का ही कमाल है कि इस त्यौहार में भी चीनी हम लोंगों को कडवी नहीं लग रही है.बच्चो कातो उत्साह आज चरम पर है लाई-चूड़ा -गट्टा तो नानी के यहाँ से ही गया है और पतंग तो पिछले १५ दिन सेइकट्ठा की ही जा रही थी ,अब दो-तीन दिन धूम मचेगी।
खिचड़ी के समय हमारे बाज़ार नौपेडवा में आज शाम के बजे की कुछ चित्रमय झांकी देखें- - - -
-
(लाई -चूड़ा -गट्टा से सजी दुकानें और खरीददारी करते लोग )
(ताजे गुड का तिलवा)

(नौपेडवा का ताज़ा
पेड़ा,जिसके साथ लाई-चूड़ा खाने का मज़ा ही कुछ और है)
(त्यौहार पर भारी मांग को देखते हुए ,पेड़ा के साथ हरी काका पेड़ा वाले )
(हमें भी कंद लेना है -जल्दी करो भइया , शाम होने को है)

36 टिप्‍पणियां:

  1. आप भी ना , इतने अच्छे फोटो लगा दिये है कि बस अब खाने को मन कर रहा है । आपको मकर संक्रान्ति की बहुत-बहुत बधाई ।

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  2. का भैया! मुँह में पानी लाय दिए!!
    बहुत बढ़िया लेख, चित्रों के तो क्या कहने !
    मस्त हुइ गए।
    बहुत बहुत आभार।
    ___________________

    सही कह रहे हैं, गँवई लोग उत्सव मनाने के संसाधन और उमंग का जुगाड़ कर ही लेते हैं। इसी ने तो हमें सदियों से जीवित रखा। धर्म, उत्सव और कृषि कितनी सफाई से एक दूसरे में बुन दिए गए हैं!
    हमारी जीवनी शक्ति तो यही है।

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  3. -----------मेरे मुंह में तो पानी आ गया , शानदार और जानदार पोस्ट .
    खिचड़ी की आपको बधाई.

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  4. -----------मेरे मुंह में तो पानी आ गया , शानदार और जानदार पोस्ट .
    खिचड़ी की आपको बधाई.

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  5. उत्सव प्रिया मानवा -यह बात गाँव गिरांव के उत्सवों पर आज भी ज्यादा लागू होती है -पेडा देखकर तो खाने को मन हो आया .

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  6. डा. साहब ,
    नए साल के आगाज़ पर आप ' सोहर ' सहित पुनारागामित हुए , मन प्रसन्न हुआ और फिर आपको रफ़्तार में देख पुलकित हूँ .
    खिचडी की अनगिनत यादें आ गयीं. फुवा लोगन और बहिनियौरे न जाने कितनी खिचदियाँ पहुँचाने का सौभाग्य मिला .माई हमार इस वक्त मुंबई में हैं और यहीं से फरमान जारी कर सब खिचदियाँ समय पर पहुँचाने का बंदोबस्त कर आश्वस्त हो गयी हैं .और अब भी हमारे मामा के घर से बिना रुके लगातार ' खिचडी ' पाने का रिकार्ड बता खुद और हम सब को गौरवान्वित करती हैं .इस साल उदास हैं की ..........खिचडी पर गाँव में नहीं हैं . मैं भी ,की इस बार भारत में हो के भी गाँव में नहीं हूँ .

    इस संक्रांति पर आप और आपके पाठकों को मेरा ' तिलवा ' और बधाईयाँ.

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  7. आपके क्षेत्र से सम्बंधित बातें पढ़ना और चित्र देखना हमेशा अच्छा लगता है
    आज तो तिल की चक्की खाने का मन कर रहा है जी ..
    इस कहते हैं ब्लोगींग
    ठण्ड कैसी है ?
    स स्नेह,
    - लावण्या

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  8. अरे वाह... हमे तो आप ने लालच ही दिया बहुत सुंदर लेख ओर चित्र भी अति सुंदर, सब से ज्यादा सुंदर लगी हरी काका की बाते

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  9. मकर संक्रांति पर्व की हार्दिक शुभकामना . भगवान सूर्य की पहली किरण आपके जीवन में उमंग और नई उर्जा प्रदान करे

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  10. मिश्र जी, अभी तो लोहड़ी की मूंगफली, रेवड़ी और फुल्ले खये हैं। ऊपर से आपके पेडे देखकर तो फिर भूख लग आई।
    सच आजकल हम अपने त्योहारों को शहर में भूलते जा रहे हैं।

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  11. पहला पैराग्राफ जानकारी के लिहाज से बड़ा सुन्दर लगा , संग्रहणीय भी ...
    क्या सधी प्रस्तुति रही ... मुंह में पानी आ गया ...
    मकर - संक्रांति ( खिचड़ी ) की बधाई ... ...

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  12. हम तो यहाँ आने के बाद भूल ही गये हैं,त्योहारों का मूल स्वरूप और आयोजन.
    मीठाईयाँ,पकवान ..वो स्वाद कहाँ?
    बड़ी ही सामयिक पोस्ट है.
    ताजे गुड का तिलवा!!!!!!!!:(.....पेड़े देख कर कौन नहीं लालचाएगा!
    मकर संक्रांति पर्व की हार्दिक शुभकामनाए

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  13. ये वाले पेड़े तो हमने पहली बार देखे हैं जल्दी से खवा भी दें तो मजा आ जाये। :)

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  14. बहुत अच्छी लगी यह रचना।
    मकर संक्रांति पर्व की हार्दिक शुभकामना।

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  15. @विवेक भाई, कहिये तो भिजवा दें.आपके मुंबई में तो अक्खा जौनपुर रहता है ,किसी से भी भेज सकते हैं.

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  16. इतनी गहरी विवेचना के लिये आप बधाई के पात्र हैं।अच्छा और सारगर्भित लेख....

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  17. आज यहाँ मुंबई से मेरी श्रीमती जी ने अपने मायके में फोन कर अपने भाई से कहा कि क्या फायदा तुम लोगों का, खिचडी तो पहुंचा गये होते मेरे यहां..इधर मैं लाई, चना और रेवडी बाजार से खरीद रही हूँ.......सुनते ही छोटे साले ने फोन ले कहा - ढेर मत बोलो, कल ही दो बोरे तुम्हारे ससुराल में रख आया हूँ....आई हो बडी खिचडी वाली :)

    अरे भई, हर ओर जब उत्सव का माहौल हो तो यह और इस तरह की बातें बडी मनोहारी हो जाती हैं।

    चित्रों ने तो समां बांध दिया। बहूत खूब।

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  18. हमारे मुंह में तो पानी आरहा है.:)

    मकर सक्रांति पर्व की हार्दिक बधाई.

    रामराम.

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. कल जल्दी में लिखी थी टिप्पणी इसलिए हरी काका के बारे में लिखना रह गया था.आज भी पुराने दाम पर पेड़े बेचने waale 'हरी काका की दरियादिली को नमन और शुभकामनाएँ.

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  21. ----------आज सबेरे से घर वाला तिलवा ढूढ़ते रहे लेकिन वह स्वाद ,यहाँ नहीं मिला --

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  22. जानते हैं मनोज जी, बिल्कुल ऐसे ही पेडे मेरे नैहर नौगांव से झांसी जाते वक्त रास्ते में एक स्थान मिलता है " बरुआ सागर" वहां भी म्लते हैं. ये पेडे वहां की विशेषता हैं.

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  23. पानी आ गया मुँह में हमारे भी ........ त्योहारों का मज़ा अपने देश में ही है .......... लॉहड़ी और मकर संक्रांति की बहुत बहुत बधाई ..........

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  24. इसे कहते हैं आते ही छा जाना चलिए ये तो आपकी अदा है इसे कहते हैं संवेदनशीलता आपके अन्दर का बच्चा अभी भी जिन्दा है इसे जिन्दा रखियेगा
    मकर संक्रांति की बधाई

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  25. मकर-संक्रांति की आप को हार्दिक शुभकामनाये .........आपके ब्लॉग पर नौपेडवा का ताज़ा पेड़ा देख कर मुह में पानी आगया . अब अगली मुलाकात में आप को इसको खिलाना भी होगा.

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  26. इतना कुछ तो पता नहीं था इस बारे में ..चित्र के साथ और भी अच्छा लगा इसको पढना शुक्रिया मकर संक्रांति की बधाई

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  27. बड़ा ही विचित्र पेड़ा है, ऐसा पेड़ा तो हमने पहली बार देखा है.
    ये नौपेडवा कहाँ पर है और क्या हरी काका का पेड़ा इसी समय में मिलता है या बारहोंमास. कृपया ज़रूर बताइयेगा.
    आपको मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं.

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  28. मकर संक्रांति की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ!
    बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने और साथ ही इतना सुन्दर चित्र को देखकर मुँह में पानी आ गया!

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  29. guruji pranam. apne shishya Deepak mishra se khichadi ki badhai sweekar karen. sach bataun ghar se door pardesh me rahkar jab aapki ye post padhi to man lalcha gaya. lekh lajwab, phoutuen bemishal.

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  30. @ जाकिर भाई , वहाँ से यहाँ ४ घंटे का सफर है ,आ जाइये आपको कुछ खिला दिया जाए.

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  31. bबहुत अच्छी लगी आपके गाँव की मकर संक्राँति। हरी काका का पेडा हमारे लिये भी रख लें खाने आते हैं बहुत बहुत बधाई मकर संक्राँति की

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  32. bada maza aaya yahan thandi ke vibhinn swado ko lekar aur tyoharo ki raunak dekhkar ,ye pede kabhi khaye nahi dekh kar ji lalcha gaya ,makar sankranti ki badhai .

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  33. पेड़ा तो सच्ची में गप्प से खाने का मन कर रहा है। सुन्दर फोटो! धांसू विवरण!

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