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प्राचीन भारतीय मनीषियों नें शिक्षा को सर्वाधिक महत्व प्रदान करते हुए इसे आध्यात्मिक तथा भौतिक उत्थान हेतु एक महत्त्वपूर्ण कारक माना है .प्राचीन शिक्षा ब्यवस्था के शैशव कलेवर से ही यह ध्वनित है की बगैर विद्या और ज्ञान से सम्पन्न हुआ ब्यक्ति ऋषि ऋण से मुक्त नहीं हो सकता था .प्राचीन शिक्षा ब्यवस्था का पथ ,पाथेय तथा पथ की दिशा स्पष्ट थी .ऋग्वैदिक समाज में भौतिक उपलब्धियों की अपेक्षा बौद्धिक ज्ञान की महत्ता अधिक थी .उपनिष्दों में विद्या का तादात्म्य देवलोक से स्थापित किया गया है .वृह्दारण्यक उपनिषद के १.५.१६ में वर्णित है कि देव लोक केवल विद्या द्वारा ही जीता जा सकता है .महाभारत १२.३३९.६ में कहा गया है कि विद्या के समान नेत्र तथा सत्य के समान तप कोई दूसरा नहीं है "नास्ति विद्यासमम चक्षु नास्ति सत्य समम तपः".इसे मोक्ष का साधन माना गया -"साविद्या या विमुक्तये ".चरित्र निर्माण ,ब्यक्तित्व विकास ,सामाजिक कर्तब्यों का ज्ञान एवं समाज तथा राष्ट्र के उत्थान के लिए शिक्षा एक महती आवश्यकता मानी गयी .प्राचीन विचारकों नें शिक्षा के ब्यवसायिक करण का घोर विरोध किया है .कालिदास ने अपनें महाग्रंथ मालविकाग्निमित्रम १.१७ में लिखा है कि शिक्षा के द्वारा मनुष्य आजीविका का साधन प्राप्त करता है किन्तु इसे मात्र आजीविका का साधन बनाना अभीष्ट नहीं है .तैत्तरीय उपनिषद् १.११ में वर्णित है कि आचार्य देवता होता है तथा एक आचार्य की कामना होती है की संयमी ,शीलवान और शांत स्वभाव वाले शिष्य आचार्य के पास शिक्षा ग्रहण करें ताकि आचार्य यशस्वी बनें .कालिदास नें रघुवंश ३.२९ में गुरु शिष्य सम्बन्ध को परिभाषित करते हुए "गुरुवो गुरुप्रियम "कहा है .
पूर्व वैदिक काल में शिक्षा का मुख्य पाठ्यक्रम वैदिक साहित्य का अध्ययन ही था .पवित्र वैदिक ऋचाओं के अलावा पुराण -इतिहास ,गाथा नाराशंसी ,खगोल विद्या ,ज्यामिती तथा छंद शास्त्र आदि अध्ययन के प्रिय विषय थे .इस युग में शिक्षा प्रायः मौखिक हुआ करती थी ,जिसमें पवित्र मंत्रों को कंठस्थ करनें का आग्रह हुआ करता था .प्राचीन इतिहास के प्रायः सभी समय में शिक्षा प्राप्ति के लिए "गुरुकुल पद्धति "का प्रचलन था .केवल उपनिषदों में गुरुकुल के स्थान पर आचार्य कुल का प्रयोग किया गया है ."कुल" का अर्थ बहुत सारगर्भित था ,जिससे एक परम्परा का बोध होता था .आचार्य कुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करनें वाले छात्र को "अन्तेवासी " कहा जाता था .छान्दोग्य उपनिषद् २.२३ में गुरुकुल में रहकर विद्या ग्रहण करनें वाले छात्रों को आचार्य कुलवासी,अन्तेवासी तथा ब्रहमचर्यवास जैसे संबोधनों से संबोधित किया जाता था .
वैदिक कालीन समाज में शिक्षा की सबसे महान उपलब्धि नारी -शिक्षा थी ।लोपामुद्रा ,विश्ववारा .आत्रेयी और अपाला जैसी विदुषी नारियों नें उस युग में अपनी विद्वता के झंडे गाड़ रखे थे . यह परम्परा उत्तरवैदिक काल से होते हुए महाकाब्यकाल तक कायम रही फिर उत्तरोत्तर उसमें गिरावट के संकेत दृष्टिगोचर होतें हैं .हालाँकि बौद्ध एवं जैन साहित्य ,राजशेखर की काब्यमीमांसा तथा गाथा सप्तशती आदि में अनेक विदुषी एवं कवि स्त्रियों का उल्लेख किया गया है ,जिन्होनें अनेक गाथाओं की रचना की थी परन्तु परवर्ती साहित्य से आभास मिलता है कि तत्कालीन भारत में नारी शिक्षा पर प्रतिबन्ध लगनें लगा था .यह प्रतिबन्ध शनैः -शनैः परवर्ती युगों में इतना कठोर हो गया की राजपूत काल आते -आते स्त्री शिक्षा बिलकुल बंद होने के कगार पर पहुंच गयी थी .
जारी .........
कभी हंस दिखे बगुला से लगे ,कभी कोकिल से कभी काग लगे थे |
भाषण में रट्टू तोता लगे ,कभी बुलबुल से कभी गिद्ध लगे थे ||
सोनपांखी दिखे चरखी से लगे ,कभी मोर दिखे कभी चील्ह लगे थे |
कौन सी माया पढ़े हो लला ,उल्लू से दिखे पर बाज लगे थे ||
कभी गाय दिखे पर सांड लगे ,कभी लोमडी तो कभी श्वान रहे थे |
कभी सिंह की भांति दहाड़ रहे ,कभी गीदड़ से छिप भाग रहे थे ||
बैल की भांति जुटे थे कहीं ,बिल्ले सा मलाई उड़ा रहे थे ||
बन मानुस से लगते थे लला ,पर माल पे हाथ लगा रहे थे ||
(राजेंद्र स्मृति ग्रन्थ से साभार ,रचना - स्व . डॉ .राजेंद्र प्रसाद मिश्र)
आज हमारे क्षेत्र में सुबह- सबेरे एक स्थान पर, श्री राम चरित मानस का पाठ चल रहा था .सामाजिक सरोकारएवं सहभागिता निभाने मैं भी वहाँ पहुँचा .मेरे अंदर की खोज बीन वाली भावना लगातार सक्रिय रहती है ,उसी के दरम्यान मैंने देखा कि दूर एक चारपाई के पास कई लोग कुछ देख-सीख रहें हैं .उत्सुकता वश मैंनें भी अपनी दृष्टी को वहाँ केंद्रित किया तो मुझे एक अनोखा दृश्य दिखाई दिया वह यह कि एक बुजुर्ग सज्जन अपनी शेविंग नंगी ब्लेड से कर रहें है .मुझे आश्चर्य हुआ क्योंकि आज इस तरह का दृश्य नतो मैंने देखा था और नही करने की कभी सोच ही सकता हूँ .यह एक जोखिम भरा कार्य है .और तो और ,उनसे इस विधा को सीखने वालों की लाइन भी लगी थी और वे सबसे बेपरवाह अपने नित्य, दैनिक कर्म में लगे थे .मैंने तुरंत अपने कैमरे (जो कि सदैव मेरे साथ रहता है ) से उनकी तस्वीर उतारी ताकि आप भी इस नवीनता को देख सकें क्योंकि मेरे लिए तो यह अनोखा था .

ये सज्जन हैं श्री कमला प्रसाद जी जो कि बांगर खुर्द गाँव जिला सुल्तानपुर के निवासी एक अवकाश प्राप्त प्राइमरी पाठशाला के शिक्षक हैं , अपने रिश्तेदारी के चलते निमंत्रण में जौनपुर आये हैं . मैंने उनसे कहा कि यह तो शेविंग करने का वैज्ञानिक तरीका नहीं है ,इस तरह तो कभी आप मुसीबत में पड़ जायेंगे .उन्होंने कहा कि मैं तो बिलकुल आराम से पिछले तीन दशकों से इसी तरह शेविंग कर रहा हूँ मुझे तो आज तक कभी कोई परेशानी नहीं हुई और बहुतों को मैंने इसी तरह शेविंग करना सिखाया है .मेरे लाख समझाने के बाद भी वे अपने विचारों पर अटल रहे ,और अपने तर्कों को सक्रिय करते रहे तथा लोगों को इस तरह शेविंग से होने वाले फायदे के बारे में बताते रहे . चाहे भी हो यह मेरे लिए तो बहुत ही हैरत अंगेज रहा मैनें आज तक इस तरह से किसी को शेविंग करते नहीं देखा था . दिन में कई बार सोचा कि कि कैसे -कैसे जुगाड़ लोग ढूंढ लेते हैं, इस तरह अगर सभी अपनी शेविंग करनें लगे तो फ़िर तो बंद हो जायेंगी रेजर कम्पनियाँ !

गतांक से आगे .......
मौखरियों की शासन सत्ता के बाद जौनपुर निश्चित रूप से सम्राट हर्ष के अधीन रहा होगा ,क्योंकि हर्ष की विरुद "सकलोत्तर नाथ पथकर " की थी .हर्ष के बाद जौनपुर भी पूर्व -मध्यकालीन भारत के अन्य नगरों की भांति ही सामंतवादी शासन के अंतर्गत सामंतों के अधीन ही रहा होगा एवं सामंतों तथा राजाओं के सत्ता संघर्ष का साक्षी भी अवश्य हुआ रहा होगा परन्तु निश्चित रूप से अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित न कर सका होगा .जयचंद्र के शासन काल में जौनपुर को विशेष राजनीतिक महत्व प्राप्त था जिसकी अभिब्यक्ति तत्कालीन साक्ष्य करतें हैं .ऐसे प्रमाण मिलें हैं कि जयचंद्र ने जौनपुर में एक स्थाई सैनिक शिविर स्थापित किया था तथा जफराबाद में एक उच्च अधिष्ठान पर प्राप्त स्तम्भावशेष से इस सम्भावना को बढ़त मिली है कि यहाँ कभी जयचंद्र का बैठका रहा होगा .जयचंद्र के उत्तराधिकारी हरिश्चन्द्र का एक लेख जनपद के मछलीशहर से प्राप्त हुआ है ,जिसमें उसको अनेकानेक विभूतियों से अलंकृत किया गया है .

मध्यकालीन भारतीय इतिहास के श्रोतों नें जौनपुर की स्थापना का श्रेय फिरोजशाह तुगलक को दिया है ,जिसने अपने भाई मुहम्मद बिन तुगलक (जूना खां ) की स्मृति में इस नगर को बसाया और इसका नामकरण भी उसके नाम पर किया .लेकिन एक खास बात यह है कि जौनपुर राज्य का संस्थापक मालिक सरदार (सरवर ) फिरोज़ शाह तुगलक के पुत्र सुलतान मुहम्मद का दास था जो अपनी योग्यता से १३८९ इस्वी में वजीर बना .सुलतान महमूद ने उसे मलिक -उस -शर्क की उपाधि से नवाजा था .१३९९ इसवी में उसकी मृत्यु हो गयी .उसके पद के कारण ही उसका वंश शर्की -वंश कहलाया .
ध्यातब्य है कि उसको कोई सन्तान नही थी ,उसके मौत के बाद उसका गोद लिया हुआ पुत्र मुबारक शाह गद्दी पर बैठा था .
जारी .................